की। हमने कहा कि यदि हराया है तो एक बार फिर हरा दो । रामलाल और नन्दलाल दोनों भाइयों ने (जिन के मकान में
रखामों जी उतरे हुए थे कहा कि इनके कहने से व्या लाभ है ? यदि हराया है ती फिर हरा द,परन्तुपांण्डित जी यहां तर
हराया हराया कहते रहे कि हमारी बात ही न से। अन्त को एक और बात कहा कि तुम लोग नहीं जानते हो, दयान
स्वामी वास्तव में क्रिस्तान है । उस समय हम ने कहा कि तुम भले मनुष्य नहीं हो जो ऐसे महात्मा की ऐसा कहते हो ।
व्यर्थ बातों से क्या लाभ है, स्पष्ट शास्त्रार्थ का उत्तर दो। हमारी ये सब बातें बाजार वालों के भी सनी परन्तु उन्होंने शास्ार्थ
वाली बात का कोई उत्तर न दिया और न कोई नियम निश्चित किये।

१ दिन प्रात:काल हम बुद्धि शाह सुनार की दुकान पर बैठे हुए थे। देखा कि पुस्तक का गठरी लिये हर
जी पश्चिम की ओर बाजार के मार्ग से चले आते हैं। कारण यह था कि नन्दलाल और रामलाल ने उनकी व्यर्थ बकवास
और शास्त्रार्थ से टालमटोल देखकर उपद्रव की आशंका से उन्हें वहां से निकाल दिया था, तब उन्होंने जाकर ठाकुरबाड़े में
थाने के समीप डेरा किया। आर्य समाज से विरोध कराने के अभिप्राय से चतुर्भुज मुसलमानों से बड़ा प्रेम किया करता था
और मुसलमान भी उसके सहायक होकर स्वामी जी का विरोध करते थे। हम ने चतुर्भुज का सारा वृत्तांत स्वामी जी को
सुनाया । उन्होंने कहा कि वह सामने नहीं आएगा;, दर से ही शोर मचाता रहता है ।

एक दिन यो धोखा दिया गया कि जब स्वामी जी व्याख्यान देवके तो प्रस्ताव रखा गया कि जहारी शाह के मकान
– म; जहां चतुर्भुज भी आयेगा, स्वामी जी चलकर परस्पर शास्त्रार्थ के नियम निश्चित कर लें । हम लोग उस मकान के वृत्तांत
से अपरिचित थे । वामी जी और अन्य कई सज्जन हमारी जाति के गये। बहुत से तो उस मकान के बाहर रह गये। उस
मकान में दूसरे मार्ग से पहले ही बहत से हिन्दू-मसलमान भरे थे जो उपद्रव करने के ध्येय से बैठे थे
हुए
। स्वामी जी गये
तो पूछा कि किधर है चतुर्भुज, सामने आवे और वात करे । तब गोविन्दसरन मन्री धर्मसभा’ ने कहा कि पण्डित जी ।
हैं, हमसे बात कीजिए क्योंकि उनको इस समय आंखों से नहीं सुझता । तब स्वामी जी ने कहा कि यदि नहीं सुहाता तो मुख
से प्रश्नोत्तर करे । उसने कहा कि वे सामने नहीं आएंगे क्योंकि वे कहते हैं कि हमको उनके दर्शन करने पर प्रायश्चित लगता
है। स्वामी जी ने कहा कि वे कपड़े की आड़ से बातचीत करे । गोविन्दसरन ने कहा कि हमसे आप बातचीत करे, वे नहीं
आवें ।स्वामी ने कहा कि तुम कौन हो, जिससे हम बातचीत करें, वे आवें । तब उसने एक दीपक जो जलता धा उसको
बुझा दिया और सब ने ताली बजाना आरम्भ किया। तब हमने ललकारा कि सब को मार डालेगे, ऐसा मत जानो। हमको
बाहर आने का मार्ग भी अन्धेरे के कारण विदित न था। लैम्प हमारे साथ था। हमारा एक सदस्य लैम्प लेकर स्वामी जी
के आगे चला, स्वामी जी उस के पीछे और हम सब स्वामी जी के पीछे । उन्होंने दो-तीन ढेले फेंके थे परन्तु वे हम तकन
पहुंच सके । हम दोनों हाथ में डंडा लिये हुए और यह कहते हुए कि अरे बदमाशो ! तुमको जान से मार डालेंगे, कोई आवे
तो सही, धीरे-धीरे बाहर निकल आये । हम सब भाई एकत्रित हुए और स्वामी जी को गाड़ी में बिठलाया। हमारी ओर
बहुत बलवान मनुष्य थे, वे हमारी दृढ़ता के कारण कुछ न कर सके । यद्यपि हम पहले उनके समर्थक थे और मूर्तिपूजक थे।
परन्तु उन की ऐसी करतूत से धर्मसभा से विरक्त होकर आर्यसमाज के सदस्य हो गये। फिर हम व्याख्यान के समय
आठ-दस मनुष्य सहित स्वामी जी का पहरा देते रहते थे कि कोई उपद्रवी ढेला न फेंक दे । उपदेश कम सुनते थे परन्तु
इतने पर भी कोई-कोई बात हम सुन लेते थे। वही अपने लिए पर्याप्त समझते थे। यह काम अपनी प्रसन्नता से करते थे,
किसी के कहने से नहीं।

उन्हीं दिनों एक परवाना न० ५९७ मैजिस्ट्रेट साहब की कचहरी से इस विषय पर जारी हुआ कि दर्गप्रिसाद
माधोलाल महावीरप्रसाद और जनकधारीलाल दानापुर निवासियों को विदित हो कि सब इन्स्पेक्टर दानापर की रिपोर्ट