ने कहा कि किसी के साथ खाने या न खाने में हम अधर्म नहीं मानते। ये सब बाते देश और जाति की
प्रणा से सम्बन्ध रखती है, वास्तविक धर्म से नहीं। जो समझदार है वे भी बिना आवश्यकता अपने देश या प्रथा के विरुद्ध
काम नहीं करते। क्या आप अपनी बेटी का विवाह किसी नेटिव (देश) क्रिश्चियन से कर सकते हो और करने के पश्चात्

आपको प्रसन्नता होगी? साहब ने कहा कि नहीं। तब स्वामी जी ने पूछा कि धर्म के विचार से या अपनी जाति की प्रथा के
विचार से? उन्होंने कहा कि जाति की प्रथा के विचार से । तब स्वामी जी ने कहा कि इस प्रकार देशी भाइयों की प्रथा के
अनुसार हम भी इस को नहीं करते अन्यथा हम इस को धर्म बिलकल नहीं मानते 1 यह सन कर वे मौन हो गये ।

फिर मूर्ति पूजा के विषय में चर्चा चली। मिस्टर जोन्स साहब ने पूछा कि हिन्दू लोग मूर्तिपूजा क्यों करते हैं?
स्वामी जी ने कहा कि यह मूर्ति पूजा हिन्दुओं का धर्म नहीं है व्योंकि उनके सत्यशास्तों में इसका वर्णन नही । प्रतीत होता है?
कि लोग अपने पूर्वजों की मृत्यु के पश्चात् उनके चित्र बनाकर अपने पास रखने लगे और इसी प्रकार समय व्यतीत होने
पर प्रेम की दृष्टि से उनकी पूजा आरम्भ की जैसे कि आप लोगों में बहत से लोग ईसा व मरियम का क्रास और मसीह के
शिष्यों का चित्र या मूर्ति बना कर पूजते हैं। अविद्या (अज्ञान) की ये बातें दोनों पक्षों में समान है। जिस पर वे बहुत प्रसम
हुए और हाथ मिलाकर चले गये । यह बातचीत संभव: दो घण्टे तक होती रही।

“फिर एक दिन पादरी साहब भेट के लिए स्वामी जी के बंगले पर पधारे। वहां पर स्वामी जी और जोन्स साहब
में गोमांस के विषय पर चर्चा हुई। स्वामी जी ने पूछा कि किस विचार को नेकी कहते हैं अर्थात् नेकी का क्या लक्षण है?
साहब ने कहा कि आप ही कहे । स्वामी जी ने कहा कि हम नेकी समझते हैं उस को, जिस से बहुतों का उपकार हो । साहब
ने भी स्वीकार किया। तब स्वामी जी ने कहा कि गाय से अधिक उपकार होता है या मास से ? उस अवसर पर स्वामी जी
ने विस्तृत गणना करके बतलाया (‘गोकरुणानिधि के अनुसार) कि इस दष्टि से गाय का मारना अधर्म और पालन करना
धर्म है । जोन्स साहब ने कहा कि इस से तो यह सिद्ध होता है। स्वामी जी ने पूछा कि जो बात सिद्ध हो जावे उस के अनुसार
चलना चाहिये या नहीं? साहब ने कहा कि, हां । तब स्वामी जी ने कहा कि फिर आप गोमांस क्यों खाते हैं? इस को छोड़
दीजिये । इस पर साहब बहादुर ने प्रतिज्ञा की कि मैं भविष्य में गोमांस न खाऊंगा परन्तु बकरे आदि का खाऊंगा। स्वामी
जने कहा कि हम इस की तुम्हे आज्ञा नहीं देते परनतु गाय का अवश्य निषेध करते हैं। तत्पश्चात् परस्पर प्रसन्नतापूर्वक
मिलकर चले गये।

“स्वामी जी समय के बड़े पक्के थे । ज्यों ही व्याख्यान का समय होता था घंटा बजता था, चाहे श्रोतागण आये
हों या न आये हों झट ‘ओ३म्’कहकर व्याख्यान आरम्भ कर देते थे।”

पौराणिक राज पंडित चतुर्भुज जी की करतूत
जिन दिनों स्वामी जी यहां आये तो ‘धर्मसभा’ ने अलीगढ़ के पंडित जी को व्याख्यान के लिए बुलाया था। उन
के आने से पहले ही स्वामी जी का नोटिस घूम चुका था कि जिस किसी को शास्त्रार्थ करना या कुछ पूछना हो वह अवश्य
आकर पूछ ले और व्याख्यान भी आरम्भ हो गये थे। पंडित जी के आने पर परस्पर पत्रव्यवहार आरम्भ हो गया।

बाबु सूबेदार सिंह, सौदागर सिंह और जयराम सिंह को (जो तीनों एक ही बिरादरी के स्वामी जी ने
जाकर चतुर्भुज से पूछे कि वे किस विषय पर शास्त्रार्थ करेंगे ? वे कहते हैं कि हम गये और सन्देश सुनाया कि आप लिखकर
उत्तर दीजिये कि आप किस विषय पर शास्त्रार्थ करेंगे या कि (पहले निश्चित किये बिना) जो मन में आयेगा उस पर करेगे ?
तब पंडित जी ने कागज निकाला और कहा कि मैंने वहां हराया, वहां हराया, वहां हराया। लगभग ३२ स्थानों की चर्ा