हमने एक दिन स्वामी जी से प्रश्न किया कि ईश्वर अरूप है, उसका रूप क्योकर देखें? जब उसका नाम ।
तो उसका कुछ रूप भी होगा। जिस प्रकार परमाणु समस्त आकाश में उड़ रहे हैं परन्तु कपल सूरज की किरण
झरोखे में दिखलाई देते है प्रत्येक स्थान पर नहीं वैसे ही ईश्वर है तो सर्वत्र, परन्तु ध्यान करने से सूझता है यो पही ।
हमने पूछ कि वह ध्यान क्या है? उसे भेद हमको बतलाइये जिससे हमको दीख पड़े। तब स्वामी जी ने –
कि यह जो कम सूर्य की किरणों में दीख पड़ते हैं इनका यदि लाखवां भाग किया जाये तो भी यह दुका दीखेगा बही सो
इसी प्रकार ईश्वर वर्तमान और सर्वज्ञ तो है परन्तु दिखाई नहीं देता। इसपर हमारा निश्चय हो गया कि वह असूप तो है
ध्यान से सूझता है परन्तु मूर्ति वाला नहीं है।

एक दिन जोन्स साहब सौदागर (व्यापारी) ने कहा भेजा कि हम भेट को आना चाहते हैं । फिर वह पादरी साख
मिस्टर करियर साहब ओवरसीयर और कछ मेमों के साथ पधारे । कुर्सी और चारपाइयों का प्रबन्ध किया गया था। जो
साहब ने कहा कि आप कुछ कहें । स्वामी जी ने कहा कि हम तो नित्य कहते हैं, आज आप ही कुछ कहें ताकि हम भी सने ।
अन्त में सबने यह कहा कि स्वामी जो वर्णन करे । तब स्वामी जी ने इस प्रकार कहना आरम्भ किया कि समस्त प्राकृतिक
पदार्थ जो परमेश्वर ने उत्पन्न किये है-आर्य द्रमेघ पृथिवी, वायु आदि, वे परमेश्वर ने सभी मनुष्यों के लिए बनाये है,
किसी एक के लिए नहीं (पादरी साहब स्वीकार करते गये)। जैसे परमेश्वर की बनाई हुई वस्तुएं सब के लिए है वैसे हो
परमेश्वर का बनाया हुआ धर्म भी सब के लिए समान होना चाहिये, न कि पृथक (पादरी साहब ने कहा कि हां, समान होना
बाहिये) तब स्वामी जी ने कहा कि अनुमान करो कि एक मेला है जिसमें सब धर्म के पादरी (उपदेशको मजद है और
अपने अपने धर्म का उपदेश करते है । एक अन्वेषक वहां गया और वह क्रिश्चियन मुसलमान हिन्दू जैन आदि जिनकी
संख्या एक हजार तक है, सबके पास सच्चे धर्म की खोज में गया और प्रत्येक ने यह बतलाया कि हमारा धर्म सच्चा है और
ये शेष नौ-सौ निन्यानवे झूठे है। अब देखिये वहां प्रत्येक को अपनी-अपनी सच्चाई के लिए तो केवल उस-उस का ही
अपना-अपना वचन और प्रत्येक की झाई के लिए नौ-सौ निन्यानवे की साक्षी है । इस से क्या समझना चाहिये ? (साहब
ने उतर दिया कि साधारण न्याय से तो हजारों झठे ठहरते हैं ) फिर स्वामी जी ने कहा कि संसार की कोई वस्तु एकदम
हानिकारक नहीं। कुछ न कुछ लाभ प्रत्येक वस्तु रखती है इसलिए ये हजारों जो मत हैं, एकदम झठे नहीं हो सकते। कुछ
न कुछ सच्चाई इन में अवश्य है। स्वामी जी ने कहा कि अनुमान कर लो कि वह अन्वेषक एक सादी नोटबुक बनाकर फिर
उन हजारों में से प्रत्येक के पास गया और प्रत्येक से यह प्रश्न किया कि सच बोलना अच्छा है या झूठ? सब ने कहा कि
सच बोलना। फिर उसने पूछा कि चोरी करना अच्छा है या साहकारी ? सब ने कहा साहकारी । फिर पूछा कि दया करना
अच्छा है या शाप देना? सब ने कहा कि दया करना। जिन सब बातों में हजारों की एक सम्मति है, बस उस के सच्चा होने
में कोई सन्देह नहीं। इसी प्रकार जो-जो प्रश्न उसके मन में उपजे, वे सब पूछे। जिसमें सबको सम्मति हो जाये वह धर्म
है और जिसमें विरोध हो वह अधर्म सर्वात धर्म का विपरीत है। बस इन शिक्षाओं को जिस में सबको एक सम्मति है, वह
अन्वेषक एकत्रित करे । बस वही धर्म परमेश्वर की ओर से सच्चा है । इस में किसी को खींच नहीं। इस में ऐसा कहीं नहीं
है कि मुहम्मद को सिफारिश के बिना या ईसा पर विश्वास लाये बिना या राम कृष्ण की साक्षी के बिना या किसी संसारी
मनुष्य के साधन के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती। इतना कहकर स्वामी जी ने पूछा कि इस में आप लोगों को कुछ कहना
है ? तब जोन्स साहब बोले कि आप इस प्रकार से इन बातों को कहते है कि इनके विरुद्ध कहने में कठिनाई पड़ती है; परन्तु
जब ऐसा ही विचार आपका है तो आप छूत छात क्यों मानते हैं? हमारे साथ खाने में क्या आपत्ति रखते हैं?