| उसके१न्त ज्ञान ना ।वास्व ३ और आध्यात्मिक बात
६ नवम्बर सन् १८०९शेमैनेजर के नाम पत्र लिखते है–जबकतदानापूर में प्रतिदिन व्याख्यान
१ पांचवा दिन है। यह समाज और समाज के पुरूष बहुत उत्तम हैं। समाज का प्रबन्ध भी बहुत उत्तम किया
3 दो से अलवर के पर हरिहर क्षेत्र के मेले में जाना होगा। वहां से कार्तिको पूर्णमासी के अनन्तर काशी कर
ने का प्रबंध किया जाएगा और वहां आधे चैत या अन्त तक ठहरेगे ।

दयानन्द सरस्वती, दानापुर
दिन स्वभाव चव अनन्तकाल ३ एक गुलाब का फूल तोड़ा। उसे देखकर स्वामी जी ने लतकार कर कहा
सिपई तने बुरा किया । वह फूल कितनी वायु को सुगंधित करता । तुदे इसे तोड़ कर इसके नियत कार्य से इसे रोका ।
ईद पन्चात जब स्वामी जी घीर और बैठे तो स्वामी जो के एक हाथ में मक्खो उड़ाने का मोरखत था तब उक्त बाबू
ने कहा कि फूल के तोड़ने में तो आपने पाप बढता परन्तु क्या आपके हाथ में मोरल से मक्खी को कष्ट नहीं होता?
इल पर स्वामी जी ने कहा कि आत्मा से रोकने में तुम्हरे चैसे मनुष्यों ने बाधा डाली जिससे भारत का नाश हो गया।
दम जैसे निबंत और कायर लोगों से रणभूमि में क्या हो सकता है ?

मुझ माधोलाल ने २ नवम्बर, सन् १८७९ को अपने घर में स्वामी जी को बुलाकर संस्कारविधि के अनुसार हवन
यज्ञ करार यज्ञोपवीत और गायत्री उपदेश लिया था। केदारनाथ और ठाकुरप्रमाद ने जोन्स साहब के बंगले पर हवन
के पश्चात् यज्ञोपवीत ग्रहण किया।

ठाकुरदास घड़ी बनाने वाले ने वर्णन किया-हम स्वामी जी के पास प्राय: जाया करते थे। हम निवाजदास के
पंच के हैं जो सुकरात का पंथ कहलाता है। अखर बतौ, भवहरण अजों कदम आदि उन के अन्ध तथा बहत से भजन और
विनय बने हुए हैं। बथेरे मलेरिया नामक ग्राम जो जिला लखनऊ में है, वहां उनको समाधि है। हम लोग प्रणव का जाप
और योग क्रिया साधते हैं। रेचक पूरक कुम्भक अर्थात् खीचना छोड़ना और धारना साधते हैं। इनसे प्राणायाम करते
हुए हमको रोग हो गया था जिस से हमारे नाभि कमत की वायु बिगड़ गई थी। प्राय: दर्द रहता था और खाना कम होकर
कमर निर्बल हो गई थी। उस समय हमारे इस रोग को तीन वर्ष हो चुके थे। हमने स्वामी जी से सारा वृतान्त कहा । बोले
कि हम भी योग जानते हैं और प्राय: किया भी है, हम इस रोग को छुड़ा देंगे। उसी समय हमको चित लिटा कर जान हमारे
खड़े रहने दिये दोनों पांव भूमि पर जोड़कर और उन पर अपने दोनों पांव रखकर हमको इस प्रकारसे उठा दिया कि हमारे
पांव भूमि से न उठने पाये। हमारे शिर के नीचे किसी दूसरे ने हाथ देकर उठाया था। इस प्रकार करने से उसी समय हमारा
नाभि कमल ठीक हो गया और एक मिनट में हमको चंगा कर दिया। वह दर्द फिर आजतक नहीं हुआ।

घड़ी का भेद सीखा-फिर स्वामी जी ने कहा कि हम भी तुम से एक बात सीखना चाहते है क्योकि मित्रता हो
गई है। हमारे पास घड़ी है, उसको खोलने, बिगड़ने पर ठीक करने का भेद हम नहीं जानते, उसको बतला दीजिये । हम
ने उस घड़ी को उनके सामने खोला ठीक किया। नई कमानी लगाई और सब विधि स्वामी जी को बतला दी और दो
उपकरण अर्थात् चिमटी और पेचकस भी स्वामी जी को दे दिये। स्वामी जी उनका मूल्य देने लगे । हमने इन्कार किया कि
जब हमारा आपसे गुरुभाव हो गया तो हम आप से कुछ नहीं लेते ।