एक दिन मुसलमानों ने शरारत को ध्यान से स्थान के बहत ही समीप एक मीलवी वाइज को रखड़ा कर
क्या । हिन्दू भी उसके साथ मिले हुए धे वयोकि गत चतजमेरो काग में बहुत चतुर है। यह मौलवी इतना असभ्य
था कि उसे स्वामी जी का नाम भी ठीक से लेना नहीं आता था। वह र्वामी जी के स्थान पर अरसामी जी कहता था । जय
हम ने विष्न होते देखा तो इंटर साहब को सूचना दी जिसने आकर रात्काल हटा दिया और व्याख्यान की समाप्ति तक
वहां कुर्सी डालकर बैठा रहा और भविष्य में भी ऐसा ही किया । प्रत्यत एक दिन एक पादरी साहब और कई अंग्रेजों को
भी लगाया और उपदेश सुनाया।

“एक दिन बाबू गुलाबचंद लाल ने स्वामी जी से कहा कि महाराज ! आप मुसलमानों के विरुद्ध कुछ न कहें ।
स्वामी जी ने उनको उस समय कोई उतर न दिया परन्तु जब व्याख्यान आरम्भ हुआ तो इस्लाम मत का भलीभांति खंडन
किया और कहा कि कुछ छोकरों के छोकरे हमको रोकते हैं परन्तु मैं सत्य को वयों छुपाऊ ? मुसलमानों की जब चलती
थी तो उन्होंने हम लोगों का तलवार से खण्डन किया। अब वथ्ा अन्थेर है कि वह मुझे बातों से खंडन करने में भी रुकावट
डालते है? ऐसा सुराज पाकर किसी की पोल खोलने में कभी रुक सकता हूं?”

| व्याख्यान के पश्चात् हेरे पर आकर स्वामी जी ने कहा कि यह समय ऐसा है कि किसी मत की पोल खोलने
और श्रेष्ठता दिखलाने में कोई मनुष्य किसी को नहीं रोक सकता । यह बात अंग्रेजों के राज की बड़ी बड़ाई को है। देखो।
पंजाब के किसी नगर में (जिसका नाम अब मुझे स्मरण नहीं रहा) में एक दिन व्याख्यान दे रहा था और उस से एक दिन
पहले यह विज्ञापन हो चुका था कि मैं आज ईसाई मत का खंडन करूंगा। इसलिए बहुत से विलायती (विदेशी) और नेटिव
(देशी) क्रिश्चियन और पादरी वहां आये थे और सब से बढ़कर किसी कारण से जनरल राबर्ट्स साहब बहादुर भी मेरे
व्याख्यान में पहुंच गए मेरी जिह्वा में जितनी शक्ति थी उससे बाइबिल का खंडन किया और उसका परस्पर विरोध दिखला
कर प्रबल युवतियों से उस को झूठा धर्म सिद्ध किया। व्याख्यान की समाप्ति पर बुरा मानना तो एक ओर जनरल राबर्टस
साहब इतने प्रसन्न हुए कि हम से आकर हाथ मिलाया और कहा कि निस्सन्देह आप निर्भीक मनुष्य हैं। जब हमारे सामने
आपने हमारे मत कर इतना खंडन किया और नहीं डरे तो अन्य किसी से तो क्या डरते होंगे और प्रसन्न होकर चले गये ।

“एक दिन ठाकुरप्रसाद सुनार ने (जिसने इससे कुछ दिन पहले एक सी की विद्यमानता में भी दूसरा विवाह कर
लिया था) स्वामी जी से पूछा कि मुझ को योग की विधि बतलाइये ताकि मैं उस पर आचरण करू । स्वामी जी ने इस
वृत्तान्त के जाने बिना ही उत्तर दिया कि तू एक विवाह और कर ले तब तेरा योग ठीक हो जावेगा । जिसे सुनकर वह चकित
रह गया और फिर कभी योग सीखने की इच्छा न की।

उसी ने एक बार समाज की सदस्यता की अवस्था में बातचीत के समय सभा में एक सदस्य से कटुवचन कहे
जिस पर हम लोगों ने उसे रोका और वह क्रुद्ध होकर चला गया । हमने उस का नाम काट दिया। वह नाम काटने पर अप्रसन्न
था। स्वामी जी के पधारने पर उसने स्वामी जी से सिफारिश कराई कि मझे भरती कर लिया जावे । हम लोगों ने स्वामी जी
से निवेदन किया कि आप बिना नियम के कहें तो हम कर लेते हैं अन्यथा नियम यह है कि यह एक क्षमा का प्रार्थना-पत्र :
सभा में े । स्वामी जी ने कहा कि ठीक है, हम बिना नियम के कभी नहीं कहते और न बिना नियम के कोई काम होना
चाहिये।

बाबू शिवगुलामप्रसाद (जो बहुत भंग पिया करते थे) ने स्वामी जी से पूछा कि मन एकाग्र होने का कोई उपाय
बताइए। स्वामी जी ने कहा कि तुम दो तोला भांग पी लिया करो, फिर ध्यान खूब जमेगा । वह सुनकर बहुत चकित