जाल यहा पर बहुत से लोग गाड़ी और टमाटर लेकर वहाँ पहंच गये थे मानो एक प्रकार का मेला शा। लट
पर लगभग १५ मनुष्य थे । मार्ग में बाजार के दोनों ओर हजारों मनुष्य वे। जोड़ी में चढ़कर यहाँ दानापुर में आकर बाबू
लाल के मकान पर ठहरे, लोगों से भेंट की और चाय पी।

गाने तो आलर्क मुकदमा
यहां पर ही बाबू उमा प्रसाद मुखर्जी, हेडकलर्क महकमा मजिस्ट्रेट साहब ने प्रश्न किया । वायु–यद्यपि आपको
ठीक है परन्तु लोग हठ से न माने तो आप क्या करेंगे ? स्वामी-हमारा काम इतना ही है कि हमारे कबन को लोग
कान में स्थान दें और जब वे उसको पूरा-पूरा सम लेंगे तो वे (हमारे कथना सई की भांति भीतर वभ् जायेंगे, निकालने से न
करेंगे। यदि उनका कोई मित्र या प्यारा एकान्त में पूछेगा तो स्पष्ट कह देंगे कि ठीक है। हठ या लोभ-लालच से न कहें

तो न कहे ।।

स्वामी जी वहां से भोजन करके बंगला जोन्स साहब(जो वीधा लाज’ कहलाता है और जो साहव बहादुर ने बिना
किराये दिया था) पथारे । चूकि व्याख्यान छावनी की सीमा में होने थे इस कारण हमने साहब मैजिस्ट्रेट बहादुर कैम्प दानापुर
से प्रार्थना पत्र द्वारा आशा मांगी। ३१ अक्टूबर को निम्नलिखित आज्ञा मिली-दन ध्याख्यानों के होने में हमको कोई
आपत्ति नहीं परन्तु शर्त यह है कि व्याख्यानदाता और उनके मानने वाले (अनुयायी) दूसरों के हदय को न दुखावे, जो उनसे
दे।”
भिन विवाह के हैं और मिस्टर गिलबर्ट इंस्पैक्टर पुलिस से कहा जावे कि कोलाहल रोकने के लिए आवश्यक प्रवन्ध कर

-मेजर एच० बेलो मजिस्ट्रेट, बैंक दानापुर । ३० अक्टूबर, १८७९ ।
फिर २ नवम्बर, सन् १८७९ को निम्नलिखित विज्ञापन अंग्रेजी अनुवाद सहित छपवा कर लगवाया गया

विज्ञापन
सब सज्जन लोगों को विदित हो कि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज कार्तिक बदि२,संवत् १९३६ गुरुवार
के दिन कानपुर में आकर वीघा लाज’ नामक बंगले में ठहरे हैं। जिस किसी को उनसे मिलने की इच्छा हो वह उक्त स्थान
में प्रात:काल ८ बजे से लेकर साढ़े नौ बजे तक और जिस दिन व्याख्यान हो उस दिन सन्ध्या के ५ बजे से १० बजे तक
उपस्थित होकर वेदादि असत्य शास्त्रानुकूल और युक्तिपूर्वक संवाद करे, सत्यासत्य का निश्चय कर परस्पर सत्य का ग्रहण
असत्य का त्याग करें और उक्त स्वामी जी दो नवम्बर, सन् १८७९ इतवार से लेकर प्रतिदिन सन्ध्या के ६ बजे से ८ बजे
तक कानपुर, नया कटड़ा में व्याख्यान देंगे। सब सज्जन लोगों को उचित है कि नियत समय पर पधार कर सने और सभा
को सुशोभित करें।

-रामलाल, मंत्री आर्य समाज कानपुर, २ नवम्बर, सन् १८७९ ।
इसी के अनुसार महावीर प्रसाद की दुकान के सामने नया खेड़ा कैम्प की सीमा में एक बड़े शामियाने को लगाकर
प्रकाश आदि के प्रबन्ध के पश्चात् व्याख्यान आरम्भ हुआ। इस तारीख से १६ नवम्बर तक निरन्तर व्याख्यान होते रहे।
केवल १३ नवम्बर सन् १८७९ तदनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी,बृहस्पतिवार को दीवाली के त्यौहार के कारण व्याख्यान
नहीं हुआ। सब मिलाकर १४ व्याख्यान है । निम्नलिखित विषयों पर व्याख्यान हुए थे-सृष्टिविषय देशोन्नति वैदिक।
पौराणिक मत खंडन, ईसाईमतखंडन, मुसलमान कीमत खंडन, धर्म में एकता की आवश्यकता, ईश्वरीय ज्ञान शिपति
मूर्ति पूजन । किसी-किसी विषय पर दो दिन, अन्यथा शेष सब पर एक-एक व्याख्यान हुआ। बीच-बीच में अवसरानुसार
नवीन वेदान्त और ब्रह्म समाज का भी खंडन करते रहे।