“फिर हमने सभा की ओर से एक पत्र छेदीलाल को लिखा कि स्वामी जी की कोई और पुस्तक है या नहीं?
छेदीलाल ने उत्तर दिया कि सुना है कि लाजर के यहां ही बनाई ‘धेदभाष्यभूमिका’ छपती है जिसा पर हम ने लाजरस
के यहां से ७ जनवरी सन् १८७८ को तीन प्रति ‘भूमिका’ को मंगवाई और उसी पर से स्वामी जी का पता ज्ञात होता रहा
और पत्र्यवहार आरम्भ हुआ। अप्रैल सन् १८७८ में हमने राम जी के कथनातुरार हिन्दू सत्य सभा’ का नाम
‘आर्यसमाज’ रखा और सब कार्यवाही नियमोपनियम के अनुसार करनी आरम्भ की और अक्तूबर, सन् १८७९ में बाबु
भोलानाथ, माखनलाल, बुद्धि लाल-इन जनों को स्वामी जी के पास दिल्ली भेजा जिस पर स्यामी जी ने यहां पधारने का
वचन दिया ।*

तत्पश्चात् जब स्वामी जी ने इधर आने का विचार किया तो हम को कानपुर से यह पत्र लिखा-“आर्यसमाज के
मन्त्री बाबू माधोलाल, आनन्दित रहो। तुम्हारी कई चिट्ठियां आई। हम सफर में रहे इसलिए चिट्ठी का जवाब नहीं भेज
सके । विज्ञापन तुम छपवा लेना । नमूना भेजते हैं और हम १६ अक्तूबर को प्रयाग जायेंगे तथ तुमको और चिट्ठी भेजेंगे।
अब हम बनारस नहीं जायेगे, मिर्जापुर से दानापुर सीधे चले जावेंगे। मार्ग में कहीं न ठहरेंगे। हमारे पास कोई मनुष्य आप
भज । जब हम दूसरी चिट्ठी लिखें तब मिर्जापुर भेजना। मुरादाबाद से विज्ञापन बाबत नवीन पुस्तक छपवाने आपके पास
गया होगा, उसके मुताबिक चंदा करने का बन्दोबस्त कर रहे होंगे । फर्रुखाबाद से एक हजार रुपये हो गये होंगे । यह
चंदा, हमको बनारस में मार्गशीर्ष में ले जाना होगा तो समझ लेना । हमको दानापुर से लौटकर आरा अथवा जहां कहीं
ठहरना होगा, वहां ठहरना। मार्गशीर्ष तक बनारस लौटकर आ जाएंगे । विज्ञापन में स्थान की जगह खोड़ दी है सो तम जो
जगह निश्चित हो लिखकर छपवा देना और तारीख की जगह छोड़ देना। जब हम आयेगे, लिखवायेंगे। हमारे रहने छ
मकान शहर से एक मील अलग रहे. इससे दूर न हो। व्याख्यान का मकान नगर में हो और रहने के मकान की जलवायु ।
अच्छी देख लेना। हरिहर क्षेत्र के मेले में जाएंगे । वहां का भी बन्दोबस्त, मकान, डेरा, तंबू वगैरा का कर लेना । अब हम
चिट्ठी मिर्जापुर से लिखेंगे और अगले महीने में बनारस आकर छापाखाना अपना बनवाने की तजवीज करेंगे सो चन्दा अपने
यहां जल्दी करना और अब बनारस में छ महीना रहने का बन्दोबस्त हुआ है, जिसमें वेदभाष्य ओर शेष पुस्तक शीघ्र छपकर
तैयार हो जाएंगे, ऐसा विचार है । मुकाम कानपुर, १२ अक्तूबर, सन् १८७९ ।”

दयानन्द सरस्वती।
इसके पश्चात् दूसरा पत्र मिर्जापुर से आया—’बाबू माधोलाल जी, आनन्दित रहो । विदित हो कि आश्विन शदि
९, गुरुवार संवत १९३६; ० २३ अक्टूबर, सन् १८७९ को हम प्रयाग से मिर्जापुर आकर सेठ रामरतन के बाग में ठहरे
हैं। अब तुम लोगों का क्या विचार है । हमारा शरीर अस्वस्थ है परन्तु तुम्हारे यहां आने का लिख चके हैं। आना तो होगा
ही। व्याख्यान होना न होना वहां आकर विदित होगा। व्याख्यान न होगा तो तुम लोगों से बातचीत तो अवश्य होगी । तुम
लोगों ने लिखा था कि हमारे सांसद आपको लेने आएंगे सो जो आने का विचार हो तो छ: दिन के बीच मिर्जापुर में पूर्वोक्त
पते पर आ जाएं क्योंकि कार्तिक बदि प्रतिपदा, ता० ३० अक्तूबर, सन् १८७९ को हम यहां से चलकर डुमरांव व आरा
अथवा पटना पहुंचेंगे । इसमें संदेह नहीं । सबसे मेरा नमस्ते *

दयानन्द सरस्वती
“इस पत्र के आने पर हमने बाबू मक्खनलाल और स्वर्गीय शामलाल को मिर्जापुर भेजा जो स्वामी जी को सैकण्ड
क्लास की गाड़ी में ले आये। पण्डित घसेन और पण्डित देवदत तथा एक सेवक ब्राह्मण (जो पहले किसी मन्दिर का
पुजारी था और अब मूर्ति पूजा छोड़कर स्वामी जी के साथ हो लिया था) साथ थे । ३० अक्तूबर, सन १८७९,