‘कस की पितत के क्रम थे थे आज नाता से वर्णय काता हूं कि सवाधी की आज बहूत अच्छे हैं । अ्याखनस
अवश्य देवेपे या पहा विलय हुआ। कोई रोया रही है। एक बाण के लिए ये चतुर हो और
या बनाने में धोखा न करे अन्यथा हमको बहुत सा शोmula neी उपशा विषगा ।
इस में स्वामो जी भाषण देवें सो हम जायेगे इल बगीथे में बाहर से भर आये थे और उसके साथ सेठ रापरतन भी
बे । उसरे स्वामी जी को कहा कि हम ३० अक्टूबर को अजमेर होते हुए भतीजे के लिए के लिए बीकानेर जा रहे
जिए हम एके रात दानापुर नही जा सकते और वे इस अदम्या ।। सैषा राल (ब्याान भष)
बगाये के लिए मे सब पशता हूं जि कपड़े पर अच्छा होगा जो महावोरपस्तद के सामने है औरर जहां कई-सी मनुष्य स्थामी जी
कार्यालय सुनने के लिए एकत्रित हो जाएंगे। यदि आपने आज्ञा पही सी है तो उषित है आप मैजिस्ट्रेट रबरी ।
से जिससे वे कभी इन्कार न करेंगे । २५ अक्टूबर, सन् १८७९. मिर्जधुर

-माखनलाल

दानापुर (बिहार) में धर्म प्रचार
(३० अक्टूबर सन् १८७९ से १९ नवम्बर, सन् १८७९ तक)
आर्य समाज दानापुर के सम्मानित सदस्यों–बाबू माधोलाल रामनारायण तया जनकधारी लाल ने वर्णन किया
कि संवत् १९६Y को हमारे मन में धर्म के विषय में अनुसंधान करने का विचार उत्पन्न ुआ । उस समय हम अपना मूल
जारी करके उस में पढ़ाया करते थे । मूर्ति पूजा को श्रद्धा हमारे मन से उठ गई थी। कोई धर्म पुस्तक होने से हमने अपने
आपके विचार पन्धी*घोषित किया था और निम्नलिखित व्यक्ति मिलकर तर्क-वितर्क किया करते थे-शिवगुलामश्रसाद
उकुरसाद शाह, बाबूलाल श्यामलाल हरतात् माधो लाल उपकधारो लाल और विचार-सभा उसका नाम रखा हुआ
श। उसमें बहरे वृन्दावन वैदिक धर्म तत्व’ अर्थात् ‘मकजने ब्रह्मज्ञान’ आदि पढ़ा जाता था। इस के एक-दो वर्ष पश्चाद
जब हमने मंशा कन्हैयालाल अलखधारी की पुस्तकों को देखा और सदस्य भी अधिक हो गये तो उसका पाम हिन्दू
सत्यसभा रखा गया जिसमें ब्रह्म समाज को कुछ पुस्तके पढ़ी जाती थी। तारक वाव नन्दलाल गुप्तु शिवचंद्रसिह मुले

गणेश प्रसाद ब्रह्म समाज के विचार के लोग थे और इसी के विषय में व्याख्यान दिया करते थे।

*एक बार जनकधारी लाल बनारस गये। उन दिनों ‘सत्यार्थ प्रकाश वहां प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने वहां से
लौटकर ग्यारहवें समुल्लास के कुछ रही साफ दिखलाये और कहा कि दयानन्द स्वामी की ओर से एक पाठशाला बनारस
लक्ष् कुंड पर है और उसी स्थान पर मुंशी हर बन्सीलाल का एक छापाखाना है जिसमें यह ‘सत्यार्थप्रकाश Uप रहा है।
मुंशी हरबंस लाल से भी मिले थे। एक व्यक्ति छेदीलाल, जो पहले दानापुर में रह गया था वह उस समय प्रेस में देखने
बाला घाटी के यहां ये ठहरे थे और वहां से ही पूफ के टुकड़े मिले थे और उन्हीं के मुख से दयानन्द स्वामी जी को प्रशसा
सुना कि वे बहुत बड़े मनुष्य है। पूछा कि क्योंकर बड़े है? उत्तर दिया कि सत्य के कहने में कितनी ही अपम्। ।
क्यों उत्पन्न हो परन्तु वे सत्य कहने से नहीं रुकते, सो यह काम महात्मा का है प्रत्येक से बरी हो सकता ।
नते हुए भी बहुत से कारणों से पूरा सत्य नहीं कहते । स्वामी जी में केवल विद्या ही नहीं है अपित है ।
और सत्य की ओर ददता भी वैसी ही है। उन रही पच्चा को उन्होने यहां लाकर सभा में सुनाया जिसे बहुत लोगों के पद
किया।

दुसरे वर्ष हरिहर क्षेत्र के मेले पर जो कार्तिक की पूर्णिमा को होता है हम गये और या मशि
प्रति मिली जिसको एक सभासद ने मोल ले लिया। हम लोग उसकी आदि में अतक पद यात सनराए।’