अग्राह्य है तो विश्रान्तघाट खनौत पर जो बाग महाराज नंद गोपाल जी का है अथवा लालबहादुर लाल के बाग में जहा
रुचि होवे वहां स्वीकार कीजिये और इन व्यर्थ वार्ताओं से हमारा समय व्यर्थ न गमाइये । रविवार को २ बजे से ६
बजे तक शास्त्रार्थ होना चाहिये । रात्रि में शास्त्रार्थ करने का कौन अवसर है ? मध्यस्थ के विषय में जो चारों वेद और ब्रह्मा
से जैमिनि समय पर्यन्त जो पदार्थ बोधक शास्त्र आप अंगीकार करते हो-यह कथन आपका क्या है ? जैमिनि समय पर्यन्त
कोई ग्रन्थ वेदार्थ प्रतिपादक नही हुआ है।”हां,सत्रादि और पदक्रम आदि ग्रन्थ पर्यन्त दस बैठती है। अन्य कोई अर्थप्रतिपादक
सायण महीधर आदि प्रभुति सदश नहीं है। जो कोई ग्रंथ आपके पास हो तो दिखलाइये । परन्तु ग्रन्थ सो केट सब से जय
पराजय के प्रति उत्तरदाता नहीं हो सकते किन्तु हमारे पत्र लिखकर सभ्यजनों के न्याय वेदविरुद्ध विषयक शास्त्रार्थ वार्ता करने
में हमारा कोई अभिप्राय नहीं है जैसा कि आपका इस विषय में । अब भी उत्सुक होवे कि उभय पदा को केवल वेदार्थ ही
चिंतन करना पड़ेगा, न स्व कपोलकल्पित वार्ता । जो आपने कथन अभिकथन में प्रश्न के दो मिनट और उत्तर के दस मिनट
किये है इस शास्त्रार्थ में यह निबंध कैसे पूर्ण हो सकता है किन्तु कभी-कभी पन्द्रह और बीस भी अपेक्षित होंगे। आपके
जिस पक्ष में शास्त्रार्थ होगा वही प्रश्न समझा जायेगा। इसमें खंडन-मंडन में उभयपक्ष को समान ही समायोग होना काहिये ।
हम अपने नियम को कदापि न त्यामेंगे अर्थात दस मिनट एक पक्ष संस्कृत उपादान करें और दूसरा उसका उल्था
देश भाषा में लिखवा देवे । इस प्रकार दसरा पक्ष विवेचना करें तो वह देशभाषा लिखावे और जो आशय सभ्यजन
लेख से न समझे वह परित्याग करें ।

1.पंडित जी जो स्यान बतलाते हैं खेद है कि वे सब हमारी दष्टि में शास्त्रार्थ के लिए तो नहीं प्रत्युत अखाड़े और दंगल के लिए
उपयुक्त प्रतीत होते हैं। पला कहां शाखा अर्थ और कहाँ अखाड़ा ? हं,इन स्थानों पर दंगे और फिसाद का अच्छा अवसर हाथ लग सकता
है।

खेद है कि यहां ऐसी बातों से घृणा है।
3. पाठक स्वयं जान सकते हैं कि कौन किसका समय व्यर्थ नष्ट कर रहा है ।
है?
4. रविवार को चिट्ठी भेजें और शास्त्रार्थ के नियम निश्चित हुए बिना रविवार को ही शास्त्रार्थ करना चाहें । ऐसा सम्भव हो सकता

5. ७ बजे शाम से ९ बजे तक का समय हमने समस्त उपस्थित लोगों की इच्छानुसार इस अभिप्राय से लिखा कि उस समय में
कचहरी के लोग भी कि जो विद्वान हैं, आ सके अन्यथा अविद्वान् लोगों के सामने शास्त्रार्थ का करना सर्वथा निरर्थक है।

6.वाह जी वाह । यह अद्भुत बात नहीं । बस पंडित जी की योग्यता का वृत्तान्त विदित हो गया । इतिहास और पुस्तकों के बनने
तक का वृत्तान्त पंडित जी को ज्ञात नही । स्वामी जी ने ये सब पुस्तकें सभा में उपस्थित लोगों के सामने निकलवा कर सब को दिखला दी
कि जिन के होने से ही पण्डित जी को इन्कार है। भला इस का क्या उतर हो सकता है ? हमारे नगर के एक योग्य पण्डित जी का भी यह
कथन है कि वेद लुप्त हो गये । भला जब इन पण्डितों की खोज इस चरम सीमा को पहुंच गई हो तो फिर क्या ठिकाना है?

1महीभरादि को टीका ऐसी बेसिर पैर की और अश्लील है, जिनका वर्णन करते हुए लज्जा आती है। क्या यह वास्तविक टीका
वेद की कहला सकती हैं? कदापि नहीं।

कभी पंद्रह और कभी बीस मिनट नियत करने से पंडित जी का विचार गड़बड़ मचाने का जान पड़ता है। भला ऐसे नियम
सभ्य और बुद्धिमान लोगों में कहीं सुने हैं? यदि विचारपूर्वक देखा जावे तो पण्डित जी के प्रत्येक वाक्य से विचित्र प्रकार की गन्ध आती
३। क्या इस पट्टी को पढ़कर कोई कह सकता है कि पंडित जी का विचार शालार्थ का है?