सहाध्यायी उनके जो शिष्य है वे सब अद्यापि राजदारों में विद्या बल से प्रतिष्व पा रहे हैं और वह समाचार भी समस्त
को
मथुरा वासी श्रेष्ठ पुरियों मालूम है कि महाराज दष्डी जो नियमपूर्वक प्रतिदिन सप्तशती स्तोत्र का पाठ और कभी-कपी
नीलकंठ महादेव जी तथा रंगने महादेव जी के श्रद्धापूर्वक दर्शन तथा तीर्थ परिक्रमा और दानादिक कर्म सब करते थे।
हां जब से कि कृष्णशास्त्री से कौमुदी में षष्ठी सप्तमी समास विषयक पत्र द्वारा शास्त्रार्थ आपश्चात् अत्यन्त बीमार हुए
तब से नागोजी भट्ट और केवटकौमुदी पर आरती प्रन्थों का खंडन पर वाक्यमीमांसा“घर्तनिराकत व्याकरण के प्रन्य बनाये
परन्तु वेद विरुद्ध मिथ्याचार कुमार प्रवृत्ति यह उनका धर्म नहीं था और न कोई उन्होंने ऐसा ग्रन्ध बनाया । इसी बात पर
आरूढ़ होकर शास्त्रार्थ से ब्रह्मा हुए। बहुत थोड़े दिन की वार्ता है मघुरावासी श्रेष्ठ पुरुषों से निश्चय हो सकता है किन्तु
मुकाम अलवर राजधानी से भी जहां कि दस वर्ष की अवस्था से रहे थे पीछे कछ दिन श्री गंगा जी घाट सोरों जी और
मथुरा जी मोहल्ला छत्ता बाजार केदारनाथ क्षत्रिय स्थान पर किराया देकररहते थे । जो प्रज्ञावलु जी पाधाजदि मूर्तिपूजा
तथा सप्तशती स्तोत्र पाठ तीर्धादिकों के विरोधी साबित होय तो मैं भी उसी मत को प्रहण करू वरन आप ऐसी बेजा हरक
हठधर्मी का परित्याग कीजिए। आप के सांसद तथा यहां शाहजहांपुर के रईसों से प्रार्थना है कि श्री मथुरा जी से निरच
कर लेंगे प्रज्ञाचक्षु मेरे भी और दयानन्द सरस्वती दोनों के गुरु हैं। जो उनका आचरण होवे वह सत्य मानकर करना चाहिये
और ज्येष्ठ कनिष्ठ व्यवहार में मैने जो लिखा है सो वंश विषयक है न कि अपने मुख से आप में उत्तम गुणों का आवेश
मान कर ज्येष्ठ बनना सभ्यता के विरुद्ध है। जो शास्त्रार्थ नियम आपने लिखे उसमें भी अन्तराशय आपका विदित हो चुका।
अर्थात् कथन अन्य और वृत्तान्त निराला और पूर्वापर विरोध भी है। स्थान के विषय में यह कथन हुआ कि ठजाडी साहद
के बंगले में शास्त्रार्थ करेंगे क्योंकि उभयपक्षों से उस स्थान को कुछ किसी प्रकार का स्वत्व सम्बन्ध नहीं है। यह कहना
आप से स्वल्प वक्ता उन को सम्भव नहीं होता है। आपका सो तो निवासद्वार प्रकट है। हमने तो उभदपक्ष रहिठ आपके
लेख अनुसार खाजाडी साहब का बाग शास्त्रार्थ के निमित्त निश्चय किया है। अब इसमें आपको निशेष करने वा अवसर
विशेष न रहना चाहिये क्योंकि इसमें तो आपके दोनों नियम साधन हो जायेंगे। इस कारण से शास्ार्थविधयक स्दान के
आग्रह करने से मालूम होता है कि आपको शास्त्रार्थ करने की इच्छा नहीं है किन्तु कथनमात्र ही है। यदि इस स्थान को

सवामी जी कहते है कि हम ने कभी इन स्थानों में जाते हुए उनको न देखा। ये सब बातें पंडित जी की मिष्या हैं। हां, 5टी
स्तोत्र का पाठ निस्सन्देह करते थे परन्तु उस को शुद्ध ना लिया था,उसके अनुसार करते थे।

2. वेद विरुद्ध चलने से कुमार्ग होता है। क्या वेद विरुद्ध चलते थे जो कुमार्गी होते ?
3.यह मिथ्या है। जब वे अलवर गये थे तब उनकी 16 वर्ष से अधिक आयु हो गई थी।
4. वेद मूर्ति पूजा नहीं करते थे प्रत्युत उसको छोड़ने का सब को उपदेश किया करते थे।

खेद है कि पंडित जी ने बताया नहीं कि यहां कथन और,औरवृतान्त और औरकहां पूर्वापरविरोध है। दिड्वियों कीतितिद
भाषा है, मौखिक नहीं कि कोई बदल सके। पंडित जी बततावें कि कहा पूर्वापर बिरोध है। अन्यथा मुख से तो सभी जो है सो ?
परन्तु क्या करें, विवश हैं, हमारा यह दस्तूर नहीं।

6.क्या दो चार दिन के ठहरने से खजङी साहब का बंगला स्वामी जी का हो गया? न वह मकान स्वामी जी का है जोर न पोडिड
जी का। इसमें क्या संदेह है? वह । कहिये यह एक ही रही कि तेरे मुंह पर ही इठ बोलता हूं। स्वामी जी ने कहा लिखा है कि जब
साहब के बाग में शीर्ष हो ? स्वामी जी ने तो खजान्ची साहब का बंगला लिखा है। पाठक पंडित जी के तेज पर विचार । ।

2 पंडित जी और स्वामी जी दोनों को छुट्टियों के देखने से लोगों को विदेत हो जावेगा कि किसका निश्चय कदनमान है।ह
को यहां अधिक लिखना योग्य नहीं।