काम-दी* मज्नार्द दिषढ़ जो कार्यदादी निश्दित हई दी वह जिस की तरफ से तोड़ी गई उसका अभिप्राय वहां ट
क्षन्द देखी पुठ्या दो जो वह समाज में पसिद दे, अच्छे प्रवार दिदित है कि यहां भी इस वृतान्दत के जानने वात
द्स-दीस पुछव बर्तन हैं और विधि दृटाट व मौलाना अब्दुलहक साहब इस्टर पुलिस और दर्ड मास्टर जित
श पुर जानते हैं। अन्ये अश्वार स्मरत करना बाहिवे कि वजान्द लाला लक्ष्मीनारायण साहब
बहीते में खाखार्द ऋदा देना त्राप ही आढर्म ा। मैंने टो अपने शारार्थ विषयक नियमों में बाग में शास्त्रार्थ करना प्रदय
होना टाका नवराई साहब बहादुर स्वर्गवासी राग (तड़ाग) पर शास्त्रार्थ करना लिया था। इससे आप
व्याग क बाग में स्म शास्त्रार्ददर्शक सौगों के द्वारा आड़ान कर आपने ही इन्कार किया। अपने कर्मों का फल दस
पर आरोपित या अन्यत्र बुद्धिमता है और जो कि श्री स्वामी जी के शिष्य होने में आपको सन्देह है,बह मिष्या है। मेन

बरेली में जो दशा हुई उसयट वस्वी जी की दीदी से विदित हो कि किसकी ओर से इन्दार हुआ। पंडित
32 श्रपत्री इछा के अंदर चार पार्टियां और उनके विकास दल ने बिना सोचे-समझे उसी को ठोक मान लिया। अब चृदि
पटित जी ने मटकी नियाज अहमद साहब थर्ड माय जिला स्कृल शाहजहांपूर को सारी के रूप में उस विषय का सच्वा वृतान्त जानन्
वाला थोपित किया है. यह समझ कर सब को आंक त्रहीं मौसवी साहब से इस बारे में जो पत्रव्यवहार किया उस को प्रतिलिपि नीचे
१४ पति घोषित किये हुए साथी से ही बरेली का वास्तविक वृढान्त पाटकों पर प्रकट हो जावे।

मौलवी नियाज अहमद शाह, थर्ड मास्टर गवर्नमेंट जिला स्कूल, शाहजहांपुर
को भेजे हुए पत्र की प्रतिलिपि
श्रीमान्जी प्रणाम के पश्चात विदित हो कि कुछ लोग इस बात की इच्छा रखते हैं कि आपसे बरेली के शास्त्रार्थ का वृत्तान्त जे
यामी दयानंद सरस्वती और पडित अंगद शास्त्री के मध्य होने वाला था, मालूम करें। इसलिए कृपया यह लिख दीजिये कि वह शाला
गि कारण से न हो सका। किम की ओर से ढील हई और ढील का कारण क्या था? उत्तर इसकी पृष्ठ पर लिख दोजिये ताकि उन को
दिखा दिया जाये। आप विश्वास है कि अच्छी प्रकार से इस वृत्तान्त को जानते होंगे। अधिक प्रणाम । आपका सेवक-वख्तावरसंह

मुंशी वातावर सिंह मंत्री आर्य समाज के नाम आया हुआ इस पत्र का उत्तर
मुंशी साहब,निवेदन है कि शास्त्रार्थ इस कारण से न हुआ कि अंगद शास्त्री के साथी पंडित दयानन्द सरस्वती का अपमान करने
पर नाम ध; ये प्रया बरेली के रहने वाले हैं। जब उनसे यह कह दिया गया कि ये सज्जन पर्म में नई-नई बातें निकालते हैं और मूर्तिपूजा
का नियम कहते हैं, लोग ठोधित हो गये और चाहते थे कि एक बड़ी भीड़ के साथ नगर के बाहर शालार्थ हो । इस बात को पंडित दयानन्द
गयती ने परन्दन किया। उनकी इच्छा थी कि विशेष लोगों के सामने किसी रईस के यहां जहाँ विद्वान् हों झगड़े वाली बातों का निर्णय
किया जाये।

-नियाज अहमद फारुकी

ये दोनों पत्र असली हमारे पास मौजूद हैं। अब पाठक विचार करें कि पंडित जी ने जो नगर के बाहर एक बड़ी भीड़ के साथ
सार्थ करना चाहती है,उसका क्या प्रयोजन था। क्या यह भारतीय दंगल था ? कहिये ऐसे स्थान से स्वामी जी यदि इन्कार न करते तो
या ते? ऐसे-ऐसे कोरले थामी जी ने पंजाब में बहुत देख लिये हैं। अब कदापि किसी के जाल में न फसेंगे अमृतसर का वृतान्ता
‘आर्य दर्पण’ पत्रिका | पाठक ने देखा होगा कि क्या हुआ था।

1 वा अशा स्वामी जी की चिट्टी का अर्थ समझे । नहीं लिखा है कि सन्देह है प्रत्युत यह स्पष्ट लिखा है कि पंडित जी भी उनके
शा ग क्योंकि उनके पास सैकड़ों विद्यार्थी आते जाते थे । क्या एक गुरु के कुछ शिष्य समान विद्या और समान गुणवान होने का दावा
कर गको ? शव नहीं कि सब समान हो । एक गुरु के पास सैकड़ों विद्यार्थी आते हैं, बहुत से योग्य हो जाते हैं और बतत से नहीं पढ़ते
तो रह जाते हैं। क्या उन सब का समानता का दावा ठीक हो सकता है? कदापि नहीं।