स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की ओर से पत्र का उत्तर

ॐ नमः सर्वशक्ति मते परमेश्वराय
क्या आप लोग मूर्ति पूजा वेद विरुद्ध काम करने से वेद विमुख होकर वेदप्रतिपादित एक अद्वितीय ईश्वरपूजा
और सत्य धर्म आदि से उलटा चल और चलाकर अपना प्रयोजन (मतलब) सिद्ध नहीं करते हैं? और क्या में कोई धर्म,
अर्थ, काम, मोक्ष सम्बन्ध कर्म वेद विरुद्ध कभी करता और कराता हूं ? जो आपको शास्त्रार्थ करने को सच्ची इच्छा होती तो
सभ्यता और विनयपूर्वक शास्त्रार्थ करने का निषेध मैंने कब किया था और अब भी नहीं करता। परन्तु जो शास्त्रार्थ को
आपकी सच्ची इच्छा होती तो जहां मैं उतरा था उसी स्थान में कर ठहरते । अन्य स्थान में ठहरने से प्रतीत होता है कि
आपकी इच्छा शास्त्रार्थ करने की नहीं है, किन्तु कहने ही मात्र है। अब आगे जैसी होगी वैसी विदित भी हो जायेगी। हां,
जहां मूर्ख और असत्य पुरुषों का हल्ला-लत्ता होता है, वहां मैं खड़ा भी नहीं होता। तुम ने जो यह लिखा कि मैं जहां-जहां
जाता है, वहां-वहां से तुम किनारा काट कर चले जाते हो यह बात तुम्हारी अत्यन्त झूठ है । तुमसे मुझ को किचिनात्र भी
भय न कभी हुआ था, न है और न होगा क्योंकि आप में ऐसे गुण नहीं हैं, जो भयप्रद हों।

बांस बरेली में भी तुम्हारी विपरीत कार्यवाही अर्थात् दंगा-बखेड़ करने वाले मनुष्यो को संग लाने के कारण
जान्वी लक्ष्मी नारायण आदि ने अपने बंगले में तुमको आने से रोक दिया था। यह तुमको तुम्हारे ही कम्मों का फल मिला
है। बरेली और शाहजहांपुर के अतिरिक्त मैंने कभी आपका आना सुना भी नहीं। अब आप और मैं दोनों शाहजहांपुर
में
हैं । जो इस समागम से भागे सो झठा । अब आपको जितना शास्त्रार्थ करने का बल हो, कर लीजिए परन्तु याद रखना चाहिए
कि सब आंतों की यही रीति है कि सर्वदा सत्य को जय हो और झूठ की पराजय हो। इसको मत भूलियेगा। मैं अपनी
विद्या और बुद्धि के अनुसार निश्चित जानता हूं कि मैं और पुरुषों को जहां तक शक्ति है-वेदोक्त सत्य सनातनधर्म पर
चलाता हूं। इसमें जो तुमको वेद विरुद्ध अपने का भ्रम हुआ सो जो शास्त्रार्थ होगा उस में तुम वेद-विरुद्ध चलते हो या मैं,
निश्चय हो जायेगा।

। हां, मथुरा में श्री स्वामी जी के पास बहुत विद्यार्थी जाते थे, आप भी कभी गये होंगे ! परन्तु जो आप स्वामी जी के
शिष्य होते तो उनके उपदेश से विरुद्ध आचरण क्यों करते? ज्येष्ठ कनिष्ठ तो उत्तम गुण-कर्म और नीच गुण-कर्मों से ही
होते हैं । इस शास्त्रार्थ में निम्नलिखित नियम उभय पक्ष वालों को मानने होंगे-=

१-इस शास्त्रार्थ में चारों वेद मध्यस्थ हैं अर्थात् वेद विरुद्ध झूठा और बेदानुकूल सच्चा माना जायेगा ।

२-इस शास्त्रार्थ में जो वेद के किसी मन्त्र-पद के अर्थ करने में विप्रतिपक्ष हो तो जिसके अर्थ पर ब्रह्मा जी से
लेकर जैमिनि मुनि पर्यन्त उक्त सनातन माननीय ग्रन्थों के प्रमाण साक्षी में मिलेंगे उसका अर्थ सत्य माना जायेगा दसरे का
नहीं । और वेदानुकूल सृष्टि क्रमानुसार प्रत्यक्ष प्रमाण लक्षण-लक्षित आप्तानुचरणाविरुद्ध और अपने आत्मा की विद्या
और वक्रता आदि इन पांच कसौटियों से परीक्षा में जो-जो सच्चा वा झूठा ठहरेगा सो-सो वैसा ही माना जायेगा अन्यथा
नहीं ।
३-एक-एक की ओर से सब धार्मिक विद्वान चतुर पचास-पचास पुरुष शास्त्रार्थ में सभासद होने चाहिये।

४-दोनों पक्षों के जिन सौ मनुष्यों को प्रथम से सभा में प्रवेश करने के लिए टिकट मिल जायेंगे, वे ही सभा में
आ सकेंगे, अन्य नहीं