क्योंकि में’ भी श्री महाराज मुक्त स्वामी जी महाराज प्रज्ञाचदु्ि को आपकी समब से पूर्व का ज्येष्ठ शिष्य विद्यारूपी वश
म हो। इसी कारण आपको ऐसा लिखना है। अगर आप मुझसे शास्ार् करना है तो इस पत्रलिखित नियमो की
एक नकल इसकी दरतखती अपनी पास मुझे भेज दीजिये। अगर आप की राय में और नियम होवे तो मुझको लिखना ।
मुनासिब समझकर स्वीकार करूंगा।

(१) अव्वल तो यहां पर कोई मध्यस्थ नहीं मालूम होता इसलिये बुद्धिमान् बहुत पास अब अंग्रेजी पढ़े
हुए धर्मात्मा पुरुष दस तथा बीस विठाय लिये जामें अव्वल जो विषय शास्ार्थ में होवे उसको संस्कृत में अव्वल मैं कह
फर उसको आप संस्कृत में अनुवाद कर व तस्दीक मेरे तर्जमा भाषा करके उक्त सज्जनों को श्रवण करा देवे। इसी तरह
पर आपके कथन को मैं समा*दंगा और जिस विषय के समझने को उक्त पुरुष असमर्थ होयेगे तो वही विषय लिखकर
दस्तखती उन लोगों को दिये जामें ।’ वह जिस पंडित को श्रेष्ठ समझे उसको दिखाकर जय पराजय का निश्चय कर ।
लगेंगे ?

1. पंडित जी ने शब्दों’ को ‘क’ और ‘मैं’ को में और तो’ को तो और के को के सारी चिट्ठी में लिखा है। बार-बार इन
शब्दों को ठीक करने की आवश्यकता नहीं।

2 ही’ का यहा कुछ अर्थ नहीं,यहाँ र होना उचित है।
1 या शब्द ‘तो’ है।
५ ‘जामें के स्थान पर जाब’ चाहिये ।
5. ‘तस्दीक’ कोई शब्द नहीं: यह तस्दीक को बिगाड़ा हुआ है।

इस नियम से स्पष्ट प्रकट है कि पंडित जी का अभिप्राय केवल यही है कि जो वाक्य स्वामी जी कहे पंडित जी उसका अर्थ

उटा सीधा करके श्रोताओं को सुना देवें । जिस समय स्वामी जी रोकें और यह कहें कि नहीं यह अर्थ इसका नहीं तो उसी समय ये लोग
जोर-जोर से बोलकर एक गड़बड़ मचा दें और यह कहकर कि स्वामी जी हार गये, हार गये खड़े हो जावें और तत्काल लट्ठ और पत्थर
चलवा दें जैसे कि अमृतसर में हो चुका है जिसका वृत्तान्त पाठकों ने ‘आर्यदर्पण’ पत्रिका में देखा होगा। यदि पंडित जी भाषा में ही बोले
तो क्या हानि है? वह भाषा भी यदि शुद्ध हो तो बड़ी बात जाननी चाहिये । पंडित जी की संस्कृत और भाषा की योग्यता तो इस चिट्ठी से
ही प्रकट है कि एक दो पृष्ठ की चिट्ठी में पचास के लगभग अशुद्धियां हैं। आश्चर्य केवल यही है कि जब पंडित जी सरकारो पाठशाला
पीलीभीत के संस्कृत के अध्यापक होकर ऐसी ऐसी प्रकट सिद्धियां करते हैं तो वहं के दीन छात्रों की तो क्या दशा होती होगी। कदाबित
इस नियम से पंडित जी का यह अभिप्राय हो कि स्वामी जी की संस्कृत की योग्यता को जांचें तो स्वामी जी ने बहुत से अन्य बनाये हैं और
वेद भाष्य संस्कृत और भाषा में प्रतिमास छपता है,उस को देखे ओर जांचें। यदि कहीं अशुद्धि हो तो निकाल कर प्रकट करें। इस अवसर
पर यह वर्णन करना भी उपयुक्त होगा कि पंडित महेश चंद्र न्यायालय कलकत्ता निवासी और पंडित गुरुप्रसाद लाहौरी ने जो पुस्तके वेदभाष्य
के खण्डन में बनाई हैं, उनका उत्तर स्वामी जी ने अत्यन्त श्रेष्ठता के साथ लिख दिया है और हमारे पास विद्यमान है । परमेश्वर ने चाहा तो
एक मास के भीतर उपकर तैयार हो जाएगा ।

२ जावे इस प्रकार लिखना चाहिये।
8 आजकल के पंडित लोग परिचय देने पर जान देते हैं।
9 यह ‘लेवेंगे है न कि लेंगे।’