पर र अलीगढ़, परन्तु आप वहां से किनारा कर चल दिये। संवत् ३३ में बरेली नगर में आकर एक इश्तहार दिया।
में भी अपना कारज छोड़कर बरेली आया । आपने प्रश्न पूर्वक मुझसे शास्तार्थ करना स्वीकार किया। उक्त संवत् मार्गशीर्ष
शुक्ल रविवार का दिन बारह बजे का तकरिर किया और कुल नियम शास्त्रार्थ के भी हो गये। समस्त जन श्रवण कांक्षी’
उनको भी प्रसिद्ध पत्र द्वारा खबर दी गई। नियुक्त समय पर पांच हजार पुरुष के जमा हुए। बर वक्त शास्तार्थ आपने इन्कार
किया और वहां से बल दिया है आपको फिर बरेली आगमन हुआ। जब तक मैंने अपने आने का अवकाश किया आय
वहां से शाहजहांपुर चले आये । मैं भी अपना निहायत काम हज्ज कर कल तारीख ९ सितम्बर सन् हाल को शहाजहांपुर
आया है। आप कृपा का शास्त्रार्थ कर लीजिये और आर्यावर्त लोगों की प्रवृत्ति सत्यमार्ग छुड़ाकर कुपथ में न कीजिये

1 पंडित जी का यह लिखना वास्तविकता के विरुद्ध है। इसका विस्तृत विवरण पाठक स्वामी जी की अगली चिद्री अर्थत् इसके
उत्तर में पाओगे

१ व शब्द पतन है, इस शब्द के स्थान पर के होना चाहिये।

1 उर्दू में तो पह शब्द लिखने में कुछ बन भी गया परन्तु नागरी कान है। केवल यदि कोई पढ़े तो कदापि समझ में न आये
कि तकरिर क्या बात है। वास्तव में यह शब्द ‘मुक्त हम प्रकार लिखना चाहिये था।

। इस शब्द इस प्रकार लिखने चाहिये ‘कांशियों को ।

| 5 राच हजार मनुष्यों को एक्रित करने से स्पष्ट है कि नीथत उपद्रव कराने की थी। क्या सारे के सारे पांच हजार मनुष्य विद्वान्
प हो स्वार्थ के मग्न गते । पटना तो एक करना व्यर्थ गा ।

यह कयन पंडित जी का वास्तविकता के विर्द है, आगे चलकर पाठकों पर पलभाति प्रकट हो जायेगा।

२१४ अगस्त से लेकर सितंबर तक २१ दिन बरेली ठरे। क्या पंडित जी की यह इच्छा थी कि एक हो स्थान पर बैठे रहते ।
प्राय हमारे देखने और सुनने में आया है कि जहां स्वामी जी एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले गये,तत्काल उन लोगों ने यह बात उहा दो
कि स्वामी जी चले गये अन्यथा हम शास्त्रार्थ करने को तैथार थे । हरिद्वार में यपपि स्वामी जी दो महीने के लगभग छहरे, विज्ञापनादि भी
चिपकाये परन्तु किसी ने शालार्थ रा नाम तक न लिया। जब वहां से देहरादून चले गये ढो श्रद्धाएम फिल्लौरी ने क्या उहा दिया कि स्वामी
जी भाग गये । अब आप ही कहिये किसी निर्मूल बात पर कैसे विरयास किया जावे। इस प्रकार हम भी कह सकते हैं कि पंडित अंगद
शास्त्री यहां से भाग गये स्वामी जी से राम्वार्थ न कर सके क्योंकि स्वामी जी के जाने से पहले घले गये परन् ऐसी बालकपन की बात
कना हमको उचित नहीं । पडित जी वहां लगभग एक सप्ताह तक ठहरे रहे, यदि वास्तव में उनकी इच्छा शालार्थ की होती तो यह समय
इस काम के लिए पर्याप्त था। बरेली में देखिये कि पादरी स्ाट साहब से तीन दिन तक कैसे आनन्द के साथ शालार्थ होता रहा ।