शाहजहांपुर में व्याख्यान व शास्त्रार्थ-चर्चा
(४ सितम्बर, सन् १८७९ से १७ सितम्बर, सन् १८७९ तक)
स्वामी जी यहां ४ सितम्बर को पधारे और बंगला खजांची साहब में जिसका पहले से प्रबन्ध कर लिया गया था,
उतरे। उसी दिन स्वामी जी की इच्छानुसार निम्नलिखित विज्ञापन छपवा कर नगर में स्थान-स्थान पर लटकाये गये और
नगर के समस्त सरसों और पंडितों की सेवा में भेजे गये।

आर्यसमाज शाहजहांपुर की ओर से विज्ञापन-(१) विदित हो कि पंडित स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज
इस
स्थान पर कल ४ सितम्बर, सन् १८७९ को दोपहर के समय पधारे हैं और बंगला खजांची साहब (जो मैजिस्ट्रेट साहब
की कोठी के पीछे है) में उतरे हैं। जिन सज्जनों को दर्शनों की अभिलाषा हो और वार्तालाप करना चाहे, वे उक्त बंगले में
पधारे।

(२) स्वामी जी के संकेत पर मिस्टर विलियम साहब बहादुर, हेडमास्टर की आज्ञानुसार सर्वसाधारण जनता की
सूचना के लिए प्रकाशित किया जाता है कि गवन मेण्ट हाईस्कूल अर्थात् सरकारी पाठशाला में जो जेलखाने के समीप है,
निम्नलिखित तिथियों में स्वामी जी का व्यख्यान होगा-शनिवार ६ सितम्बर, रविवार ७ सितम्बर, मंगलवार ९ सितम्बर
बृहस्पतिवार ११ सितम्बर, शनिवार १३ सितम्बर और रविवार १४ सितम्बर व्याख्यान प्रतिदिन ठीक पांच बजे से ७ बजे
साय तक हुआ करेगा ।
। (३) व्याख्यान शासन को इस बात की आज्ञा न होगी कि वह किसी प्रकार का प्रश्न कर सके या
व्याख्यान में हस्तक्षेप कर सके।

(6) हां, किसी सज्जन को यदि कोई
पूछनी हो तो बंगले पर जिस में स्वामी जी उतरे हुए
है, पधार कर पूछ

लें।

(५) यदि कोई हिंदू,मुसलमान ईसाई या और किसी का विचार शास्त्रार्थ का हो तो उचित है कि कृपा करके अपने
वास्तविक अभिप्राय से इस समाज को सूचित करें ताकि उसका पर्याप्त प्रबन्ध कर लिया जावे परन्तु यह ध्यान रहे कि
शास्त्रार्थ लिखित होगा, मौखिक कदापि नहीं हो सकता। शास्त्रार्थ के शेष नियम सूचना देने के समय दोनों पक्षों को सम्मति
से निश्चित कर लिये जायेगे ।

(६) चूकि बहुत से लोग स्वामी जी के चले जाने के पश्चात् इस प्रकार की बातें किया करते हैं कि स्वामी जी चले
गये अन्यथा हम शास्त्रार्थ करते । इसलिए ऐसी बातों का ध्यान रखते हुए यह भी प्रकाशित किया जाता है कि जो सज्जन
शास्त्रार्थ करना चाहें, आज से लेकर १४ सितम्बर तक अर्थात् इन्हीं दस दिनों के बीच में अपने हस्ताक्षरयुक्त लिखित
निश्चय से इस समाज को सूचित कर अनुगृहीत करें। आगे इच्छा है । इति । प्रकाशक, बजावरसिंह।

पं अंगद शास्त्री की छुट्टियां और उन पर समाज की टिप्पणी-हम चाहते हैं कि स्वामी जी के प्रत्येक व्याज्यान
सार यहां पर लिखें ताकि पाठक उसको पढ़ कर अपने धर्म कर्म आदि से भली भांति परिचित हों और वेदोक्त व्याख्यान
की जान ले । परन्तु इससे एर्व हमं एक मुख्य बात की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट करते है वह यह है कि जब लोगों को
स्वामी जी के यहां पधारने की सूचना मिली तो बड़ी खलबली मच गई। कछ सज्जनों ने जिनको शास्त्रार्थ करने की इच्छा
वी, पहित अंगद शास्त्री को बुलाया । ये पंडित जी सरकारी पाठशाता पीलीभीत में पन्द्रह रुपया मासिक वेतन पर सत्।