किया पर अन्याय पण, रक्त और करोड़ो प्रकार के दोष संस्खर में हैं। पडित जो नहीं हनेगे एक प्रकार को
इजवल्था संख्पर में है ।अंग्रेजी सरकार ने इसका प्रबंध किया है और इंवर भी इसका प्रबन्ध करेगा।

में निस्सन्देह मतोह के विषय में कोई बाल न करूंगा केवत इजना हो कहता हूँ कि इस पवित्र पुस्ठक hi में जिसके
इतना लिखा है वह उसी के वास्ते से (मिलती) है । यह दर्ट की चर्चा तो है परन्तु दर्द कविवरण नहीं है।
-ते है? जब कभी इस विश्य पर बातचीत हो तो देख तेने । मेरी केवत यहे युक्ति है कि धनपुर
देउ हैङिइना होती है और तोबा से भीे ज्ञात सोता है कि इमा होठी है ।जनने का उपाय करना और बात है
= = इतर उपासना दे पँडत जी से अंतु प्रतीत होता है और वे प्रत्येक बानो उसनझना
३गने वेद अनेक बातों के बारे में वहां पर कुछ नहीं कहता। अब इन उत्तरों देवताए गिनती
र ध्याय १ आवउ १८ जर अर्थ यह है कि ईश्वर पाप धभा करता है।

त से त य ९ आयत ४ तथा अध्याद १५ आयत १० और योहन्य का पड़ला पत्र अध्याय
अत्र ९ अर्थ यह है कि समा होता है। फिर मोह ने अपने शिष्यों को समझाया कि अपनो आयंना ने इस प्रकार
केतेकि हे ईश्वर, हमारे पात्ो को इमा कर।

अबअनुभ्वसिद्ध पुक्दियां देखतीजिए।अनुभव बहुत श्रेष्ठ कार्य है। जैसी पक्ी अनुभव को यति है वैसी

ये और दुल नहीं। मनुष्य कह सकता है कि मेरा पाप मा रो और बातें मिथ्या हैं। क्योंकि जैसे पडिठ जी ने
इयं इसमें छिपा ये दड मिलेगा। हो पाप भी है । फिर तोबा तौबा करा तो भी बही पाप मौजूद है।
इंदर के पुत्र काम लिया तब भी आप वर्तमान है। मैं जानता हू कि मनुष्य झटा दावा कर सकता है। कल्पना करो
कि वेस् चे टेक करके श्रेष्ठ मार्ग पर आवे और देवल कि अब वह बात नहीं है मनको सतोष तिहै जो वस्तु
है इसजनव है स्दे नाममात्र नहीं। अब समझाइए कि ऐसे हजारों मनुष्य संसार में है कि बिना यो अनुभव है ।
देत लिया कि निस्सन्देह ईवर ने मेरे पाप को मिटा दिया। अब वे प्रसन हैं, वह आशय और भार हृदय पर नहीं है।
बुद्ध की इच्छा मन में नहीं है। एक इज में हदय बदल गया ।

मैंने इंजन का प्रमाण प्रस्तुत किया यह कर देना शर्त है कि यह मिथ्या बात है परनतुजाने दाते जानते हैं ।।
विशद गश वह जानता है। चित्र येई कह दे कि यह धोखा है। मेरे मन के इकटालीस करोड़ ईसाई हैं, उनमे
बहुत से थे झूठे हैं,यह मैं मानता हूं और उनका कादन भी मिथ्या है परन्तु सच्चे मनुष्य भी बहुत से हैं जिनका कथन सत्य
है और उनके कनेक्शन से भी विदित होता है कि उस पाप पूर्जतवा मिट चुका है। यह अनुभव ये बात है। मैं फिर
है कि जहां तक मन और शक्ति का सम्बन्ध है यह बहुत पवकी युक्ति है। ऐसा नहीं कि हम केबल दावा करें, दाबा
इटा पी हो सकता है परन्तु जिससे पाप दावा करके पूर्णतया मिट गया ज्दा वह यदार्थ बत नहीं चरता ? जैसे दो
पिता ने पत्र में समा का वाक्य कहे तो क्या वह पुत्र नहीं जानता कि पिता ने मुझ से इम्य कर दिया। मनुष्य के इदय
ॐ यही अवस्था है।

मउउ मुक्त युक्तियों, शालेय प्रमाणों और अनुभव के आधार पर यह सिद्ध कर दियाकि ईश्वर पप इना