दयालुता का यह प्रयोजन है कि बहुत से मुठ मनुष्य नारितकता से परमात्मा का अपमान और खंडन करते और पुत्रादि
के न होने या अकाल में मरने, अतिवृष्टि, रोग और दरिद्रता के होने पर ईश्वर को गाली प्रदान आदि भी करते हैं; तथा परब्रह्म
सहन करता और गृपालता से रहित नहीं होता। यह भी उस के दयालु स्वभाव का फल है। क्या कोई न्यायाधीश कृतपापों
की क्षमा करने से अन्यायकारी और पापों के आवरण का बढ़ाने वाला सिद्ध नहीं होगा। क्या परमेश्वर कभी अपने न्यायकारी
स्वभाव से विरुद्ध अन्याय कर सकता है? हां, जैसे न्यायाधीश विद्या और सुशिक्षा करके पापियों को पाप से पृथक् करके
राजदण्ड-प्रतिष्ठित आदि करके उन को पवित्र कर सुखी कर देता है, वैसे परमात्मा का भी जानो ।
तीसरा प्रश्न-यदि आपके मत से तत्वादिकों के परमाणु नित्य हैं और कारण का गुण कार्य में रहता है तो परमाणु
जो सूक्ष्म और नृत्य है उनसे स्थूल और शांत संसार कैसे उत्पन्न हो सकता है?

उतर-सूक्ष्मता की जो परम सीमा अर्थात् जिसके आगे, स्थूल से और अधिक सूक्ष्मता कभी नहीं हो सकती वह
परमाणु कहलाता है। जिसके प्रकृत, अव्यक्त, कारण आदि नाम भी कहलाते हैं। वे अनादि भी कहलाते हैं। वे अनादि होने
से सत्य है । हाथ खेद है लोगों की उल्टी समझ पर ! कारण के जो गण उस में समवाय सम्बन्ध से हैं, वे कारण में नित्य है।
कारण के जो गुण कारणावस्था में नृत्य है वे कार्यावस्था में भी नित्य होते हैं। क्या जो गुण कारणावस्था में नित्य हैं वे
कार्यावस्था में भी वर्तमान होकर जब कारणावस्था होती है तब भी कारण के गुण नित्य नहीं होते ? और जब परमाणु मिलकर
क्यूल होते हैं या पृथक्-पृथक होकर कारणरूप होते हैं तब भी उन के विभाग और संयोग होने का सामर्थ्य, नित्य होने से,
अनित्य नहीं होता। वैसे ही गुरु, लघुत्व होने का सामर्थ्य भी उन में नित्य है क्योंकि यह गुण गुणी में समवाय सम्बन्ध
से है।

चौथा प्रश्न-मनुष्य और ईश्वर में परस्पर क्या सम्बन्ध है ? विद्याज्ञान से मनुष्य ईश्वर हो सकता है या नहीं?
जीवात्मा और परमात्मा में (परस्पर) क्या सम्बन्ध है और जीवात्मा और परमात्मा दोनों नित्य हैं और जो दोनों चेतन हैं तो
जीवात्मा परमात्मा के अधीन है या नहीं? यदि है तो क्यों है?

उत्तर–मनुष्य और ईश्वर का राजा-प्रजा, स्वामी-सेवकादि सम्बन्ध है । अल्पज्ञान होने से जीव ईश्वर कभी नहीं
हो
सकता । जीव और परमात्मा में व्याप्य व्यापकादि सम्बन्ध है । जीवात्मा परमात्मा के अधीन सदा रहता है परन्तु कर्म
करने में नहीं। किन्तु पाप कर्मों के फलभोग में वह ईश्वर की व्यवस्था के अधीन रहता है तथापि दु:ख भोगने में स्वतन्त
नहीं है। चूंकि परमेश्वर अनन्त-सामर्थ्य युक्त है और जीव अल्प सामर्थ्य वाला है; अतः उसका परमेश्वर के अधीन होना
आवश्यक है।

पांचवां प्रश्न-आप संसार की रचना और प्रलय को मानते हैं या नहीं ? जब प्रथम सृष्टि हुई तो आदि सृष्टि में
एक या बहुत उत्पन्न हुए ? जब कि उन में कर्म आदिक की कोई विशेषता नहीं थी तब परमेश्वर ने कछ मनुष्यों को ही
वेदोपदेश क्यों किया? ऐसा करने से परमेश्वर पर पक्षपात का दोष आता है।
उत्तर-संसार की रचना और प्रलय को हम मानते हैं । सृष्टि प्रवाह से अनादि है सादि नहीं; क्योकि ईश्वर के गुर
कर्म, स्वभाव अनादि और सत्य हैं। जो ऐसा नहीं मानते उनसे एछना चाहिये कि क्या प्रथम ईश्वर निकम्मा था और उसे
के गुण, कर्म,स्वभाव निकम्मे थे? जैसे परमेश्वर अनादि है. वैसे ही जगत का कारण तथा जीव भी अनादि है; क्या
किसी वस्तु के बिना ठसका का कार्य होना संभव नहीं । जैसे इस कल्प की सष्टि के आदि में बहुत से स्त्री-पुरुष उत्पन्न
थे वैसे ही पर्व कल्प की सृष्टि में भी बहुत से सी-पुरुष उत्पन्न हुए थे और आगे की कल्पान्त सृष्टियों में भी उत्पन्न