फर्रुखाबाद के पण्डितों की ओर से विज्ञापन’ दयानन्द सरस्वती के पास ये प्रश्न धर्मसभा फरूखाबाद की।
ओर से भेजे जाते हैं कि आप्त ग्रन्थों के प्रमाण से इन प्रश्नों का उत्तर पत्र द्वारा धर्मसभा के पास भेज दें और यह भी विदित
रहे कि धर्मसभा के सभासदों ने यह संकल्प कर लिया है कि यदि आप इन प्रश्नों के उत्तर पत्र द्वारा प्रमाण सहित नदेव
तो यह समझा जायेगा कि आपने अपना मत आधुनिक मान लिया और एक प्रति इन प्रश्नों की आपकी मतानुयायी सभाओं
में और अमेरिका के सज्जनों के पास भेजी जायेगी तथा देशी और अंग्रेजी पत्रों में मुद्रित की जायेगी। इन प्रश्नों पर चौदह
व्यक्तियों ने हस्ताक्षर किये थे कि जिन के नाम भारत सुदशा प्रवर्तक’ पत्रिका में लिखे हैं।

विज्ञापन का उत्तर-जो आप को शास्त्र प्रमाण सहित उत्तर अपेक्षित था, तो इतने पंडितों में से कोई एक भी तो
कछ पंडिताई दिखलाता ? आपके तो प्रश्न सब के सब अंडबंड शास् विरुद्ध यहां तक कि भाषारीति से भी शुद्ध नहीं। ऐसों
का उत्तर प्रमाण सहित मांगना, मानो गाजरों की तला देकर तरन्त विमान की मार्ग-परीक्षा करना है। शास्त्रोक्त उतर शास्ज्ञों
को ही मिलते हैं क्योंकि वे ही इन वचनों को समझ सकते हैं। तुम्हारे सामने शास्त्रोक्त वचन लिखना ऐसा है जैसा कि गंवार
मनुष्यों के आगे रनों की थैलियां खोल देना । वास्तव में तुम्हारा एक भी प्रश्न उत्तर देने के योग्य न था तथापि हमने तुष्यतु
दर्जन:* इस न्याय से सब का उत्तर शास्त्रोक्त प्रमाण सहित दिया है। समझा जाये तो समझ लो

फर्रुखाबाद के पंडितों के प्रश्न और स्वामी जी के उत्तर
पहला प्रश्न-आप्तु ग्रन्थों अर्थात् वेदादि सत्य शास्त्रों के अनुसार परिवार को अर्थात् संन्यासियों के धर्म क्या है।
वेदों के अनुसार उनको यानों अर्थात बीमारियों पर चढ़ना धूम अर्थात् हुबका आदि पीना योग्य है या नहीं ?

उत्तर-वेदादि शास्त्रों में विद्वान् होकर वेद और वेदानुकूल सत्य शास्ोक्तरीति से पक्षपात, शोक, वैर, अविद्या हठ
दुराग्रह, स्वार्थ साधन, निंदास्तुति, मान, अपमान, क्रोधादि दोषों से रहित हो स्वपरीक्षापूर्वक सत्यासत्य निश्चय करके सर्वत्र
प्रमाण पूर्वक सर्वथा सत्य ग्रहण, असत्य परित्याग से सब मनुष्यों को शारीरिक आत्मिक और सामाजिक उन्नति, उपासना के
साधन, सत्य विद्या, सनातन धर्म, स्व पुरुषार्थ युक्त करके व्यावहारिक और पारमार्थिक सुखों से वर्तमान (युक्त) करके
दुष्टाचरणों से पृथक् कर देना, संन्यासियों का धर्म है। लाभ में हर्ष, अलाभ में शोकादि से रहित होकर विमानों में बैठमा
और रोगादि निवारणार्थ औषधिवत् धूम्र अर्थात् हुक्का पीकर परोपकार करने में तत्पर, तिन्हों को कुछ भी दोष नहीं। यह
सब शास्त्रों में विधान है, परन्तु तुमको वर्तमान वेदादि सत्य शास्त्रों से विमुखता होने के कारण, भ्रम है, सो इन सत्य ग्रन्थों
से विमुखता न चाहिए।

दूसरा प्रश्न-यदि आपके मत में पापों की क्षमा नहीं होती तो मन्वादिक आप्त ग्रन्थों में प्रायश्चित का क्या फल
है? वेदादि ग्रन्थों में परमेश्वर की क्षमाशीलता और दयालुता का वर्णन है, इससे क्या प्रयोजन है? यदि उससे आगन्तुक
पापों की क्षमा से प्रयोजन है तो क्षमा न हुई और जब मनुष्य स्वतन्त्र है और आगन्तुक पापों से बचा रहे तो उसमें परमेश्वर
की क्षमाशीलता क्या काम आ सकती है?

उत्तर-हमारा, अपितु हम लोगों का, वेद-प्रतिपादित मत के अतिरिक्त और कोई कपोलकल्पित मत नहीं है।
किये हुए पापों की क्षमा वेदों में कहीं नहीं लिखी, न कोई युव्ति से भी विद्वानों के सामने किये पापों की क्षमा सिद्ध कर
सकता है । शोक ह उन मनुष्यों पर कि जो प्रश्न करना नहीं जानते और करने को उद्यत हो जाते हैं। क्या प्रायश्चित तुमने
सुख-भोग का नाम समझा है? जैसे जेलखाने में चोरी आदि पापों का फल होता है वैसे ही प्रायश्चित भी समझो। इसमें
क्षमा का कोई कथन तक नहीं । आया प्रायश्चित वहां पापों के दखरूप फल का भोग है ? कदापि नही । परमेश्वर की क्षमा