अर्थात यजमान कहता है हे परमेश्वर ? मेरे पशुओं की तू अरबट़ी प्रकार रखा कर कि जिस से मर दह़ों होम की सबरो
दूध दही प्रताप की कमी न पड़े और सन्दान पष् हो इस प्रकार इस प्रार्थना में पशुओं से गाय का प्रहन है या उहीं?ति
स्वामी जी जो पशु कहते हैं तो क्या विपरीत करते हैं परन्तु जब सब लोग यहां से वहां ठक गादपुत्र अदद बछट़ बनरे
है तो उसे क्या कहा जावे ? यह वही कहावत याद आती है कि अन्ये के आगे रेये अपने दीटे खोये’ । प्दो । स्तन
जी महाराज सरीखे दयाल और देशहितकारी की विद्यमानता में जो मनुष्य ने मनुष्यत्व प्राप्त न किन्ता टो फिर ट्ाने कर
दिन ऐसा होगा ?

अब दौड़-साथ का उत्तर

यहां तक तो बातों का जमा खर्व करने वाले और निरशर पोषों की लोला हुई
करने वाले और साक्षर अर्थात् महापारती * प्रागवरती*और न्याय, व्याकरण आदिक संस्कृत और बी0 ए० टक न्द
पढ़े हुए पापों की लीला सुनो ।

३ और ४ अक्टूबर सन् १८७२ को वहां के बड़े-बड़े प्रतिष्ठितरस और धनादय टोगों ने स्दानी जी दे टबद
में उपस्थत होकर दो सौ से लेकर हजार-हजार रुपये ठक एकत्रित करके आर्यसमाज को दृढ़ स्थापना की प्र्दन की दढ्ध
हजार रुपया वेदभाष्य अधिक पुस्तकों के शीघ्र तैयार होने के लिए पृदक दिया और बहुत से लोगों ने मसिक अन्तेखलय्य
के अनुसार देना स्वीकार किया ।

जब यह चर्चा नगर में फैली तब सब पापों का पेट पूला और उनके मस्टक में शुल बढ़ा। ज्यों-त्यों कके स
कटी।

अक्टूबर, सन् १८७९ के प्रातः बड़ी धूमधाम मचाते, तिलक लगाये, घोठी दटकादे मला हवद में लिके अने
एक प्रतिष्ठित जजमान लाला साहब के मकान पर एकत्रित होकर शरणागत हुए कि लाता साड़ब ! अब डम्ारा घन्े, तज्ज
और जीविका आप ही बचा सकते हैं और इस का उपाय अब हमने यह़ सोवा है कि स्वामी जो के पस जने का ठो ढ़नत
सामर्थ्य नहीं परन्तु वे बजने को हैं। आज हम कुछ प्रश्न बनाकर कलउन के पास भेजेगे। उनकेज्र देने बाअ्
मिलेगा नहीं । पीछे से हम तो बड़ा देंगे और सब नगरों मे प्रसिद्ध व्यादेंगे कि प्र्र्बकदकेशण्डिते के पसते जाबर
स्वामी ज न दे सके। यह सुनकर सबने कहा कि बाह वाह बड़ा अच्छा उपाय है। सारंश दड कि ऐडा हो किया अदत
पीछे अप बेंड निरर्थक प्रश्न उसी दिन तैयार किये।

अक्तुबर, सन् १८७१ को आर्य समाज के नये मकान में स्वामी जी ने व्यख्यन दिया।

अक्टूबर सन् १८७९ के सायंकाल दो पंडितों ने निम्नलिखित इ५ प्रस्न स्बन्ते जो के जस पेजे ।बल्द
में इस समय स्वामी जी को उन प्रश्नों के सामने तक दा भी अवकाश न दा परन्द उत लोगों के आने पर सुरते हो उसी सर
उनका उत्तर देना आरम्भ किया और उसे लिख देने को कहा परद्दु वे न लिख सके।

अक्टूबर, सन् १८७९ को बहुत से आर्य सभासदों ने सायं समय प्रार्न करके उन प्रस्ने के उनर स्वने जो
से लिखवा लिया और स्वामी जी के चले जाने के पश्चातु शुद्ध करके १२ अक्दबर सन १८०२ जो आर्थसनाज में खुझर
और ठत्पवात् वे उतर पोप लोगों के पास भेज दिये ।

७अक्तूबर, सन् १८७१ को कैम्प फतहगढ़ में मुस्शी गौरीदयात स्पहनबववीत के मजन पर बड़ी धून-चार के
साथ उत्तम और मनोहर व्याख्यान देकर यहां से कानपुर को चले गये।