खाने से वह केवल २० मनुष्यों को एक दिन के लिए पर्याप्त होती है। इसके अतिरिक्त उसके यदि दस बठिक हुई और
बछड़े भी हुए तो और अतिरिक्त लाभ होगा। जो बछड़े हुए तो हजारों स्थानों पर उनसे पृथ्वी जोतकर नाना प्रकारात
मन अनाज उत्पन होकर हजारों मनुष्यों को अनेक प्रकार का लाभ होगा। अब विचार करना चाहिए कि उब ए गाय के
मारने से इतनी भारी हानि होती है तो समस्त देश में प्रतिदिन हजारों गायों के मारे जाने से प्रतिवर्ष कितनी हानि होगी?
इसी प्रकार गाय से दुगनी भैंस से और तिहाई बकरी के मारे जाने से हानि होती है। अच्छी प्रकार जान लो कि इसी कारन
यह देश उजड़ हो गया है और होता चला जाता है। अब देखो कितने द:खकी बात है कि इतनी हानिको देखकर भी हनरे
देश के प्रशासक लोग इधर ध्यान नहीं देते। यह दोष केवल उन्हीं का नहीं प्रत्युत हम लोगों का पी है कि हम लोगों में
एकता न होने से यह हानि होती चली जाती है । यदि देश के मनुष्य मिलकर सरकार को प्रार्थनापत्र दें और वहांसे इस बाट
को बंद करेंगे तो क्या नहीं हो सकता है। परन्तु जब हम देखते हैं कि एक मुहल्ले के एक घर के ई-भइयों में पूट है तो
सारे देश का क्या कहना है?
गोरक्षा-विषयक व्याख्यान को गाय का निन्दक समझा-अब पाठक तनिक पोपलता पर विचार किकहां
तो यह व्याख्यान हो रहा था और कहां पोप जी ने वह प्रसिद्ध कर दिया कि देखो स्वामी जी गायको पतु बढ्लाने हैं और
उसके मारने में कुछ भी दोष नहीं, ऐसा कहते हैं । वाह रे समझ इस बुद्धि पर रोना आता है।!।

परन्तु स्वामी जी इस पोपलीला का खंडन निस्सन्देह करते हैं जिस में गी को माता” और बैल ये रिहा
जाता है और जन्म भर चाहे कितने ही पाप क्यों न करे, जहा मरते समय एक गौ का दान किया कि तत्काल पूछ पकड़े हुर
वैतरणी नदी से वैकुण्ठ में पहुँच गये। भला इनसे कोई पूछे कि वह गाय तो पोप जी के घर बंधी रहती है, पर विचार म
हुए को कहा से उस का दम पकड़ना प्राप्त होता होगा और फिर किस की पंछ पकड़कर वैतरणी तैरते होगे ? और फिर देखो
कि एक मृतक को एक गाय की पूंछ का सहारा चाहिये तो हम देखते हैं कि उस एक ही गाय से बहुत से मनोहद
से दान कराया जाता है । जब बहुत से मनुष्यों के हाथ एक ही गाय दी गई तो फिर कहिये कि बैठत्णी के टट पर इसज
उतरने के झगड़े में कैसा जूता चलता होगा? उस के उत्तर में तेरी चुप और मेरी भी चुप । अब यदि येई बड़े बुझक्ड़ हुए
तो बोले कि वाह साहब ! वह गाय तो उस समय कसाई के हाथ बहुत से ब्राह्मण जाऊ देब देते हैं। बस इसके स्मने ते
सब ही चुप जानो।

हमारे इस कहने से कोई यह न जाने कि गोदान करना ही न चाहिये। यह दान तब उबम है उब दान करने त्या
अच्छी प्रकार वेद के जानने वाले, वेदानुकूल चलने वाले कुटुम्बी सत्पात्र विप्र को देवे । हाय कैसे-कैसे शेखे दिये जडे हैं
परन्तु नाम के नयनसुखों को कुछ भी नहीं सूझता। जो कोई समझाये और दरिद्रता की जड़ काटे और तातो गौओं के
बनाने का उपाय बताएं वह वैरी, नास्तिक और जो गोदान लेकर कसाई के हाथ गाय कटवा दे वे बड़े धर्मात्मा धर्ना
कहलावे ।

हे परमेश्वर कृपा कर । इन बुद्धि वाले को सोचना चाहिये कि स्वामी जी ने गाय का माहात्म्य या शबदाय?
जो वे लोग कहते हैं कि स्वामी जी गाय को पशु कहते हैं तो इस से क्या लाभ या नि जगत् में उत्पन्न होतीो है ? विक
करो तो वास्तव में गाय पशु है या देवता ? उस को माता कहने वाले उसके पुत्र हुए वे छोटी आयु में बछड़े और बड़े आयु
में बैल कहलायेगे या नहीं? जब कोई उन से बैल या बछड़ा-ताऊ कहे तो चिढेगे या नहीं? जहां गाय से पूजा है वह
घास, भुस जल से उस को सन्तुष्ट रखने का है या गन्ध चावल, पुष्पादि से उसे पूजकर दंडवत् करना उचित है ? वेद में
होम के पीछे जो परम धार्मिक और वेदोक्त विद्यावान् यजमान ईश्वर से प्रार्थना करते हैं यजमान्–“पशु