अव जिन बातों को मानने में सब की साक्षी समान हो उस को मानो। क्या कोई ऐसी बात किसी ने कही कि
जो सब में समान हो ? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया कि हा महाराज ! बहुत सी बातें मिलती है; जैसे केवल एक ईश्वर का
मानना, उसी का ध्यान करना, सत्य बोलना और मानना, असत्य को छोड़ना, दीनी पर दया करना आदि ऐरसी बाते हैं जो सब
के धर्म में एक समान हैं। तब पंडित जी ने कहा कि यही धर्म की बातें हैं, केवल इन्हीं को मानो । शेष सब मिथ्या और
पथ-भ्रष्ट करने वाली है। इति ।

लखनऊ जाने की सूचना-यहां से स्वामी जी मैनेजर वेदभाष्य को लिखते हैं ।
“कुंवर मुन्ना सिंह छलेसर वाले का अब चन्दा वसूल करने का कुछ भरोसा नहीं, इसलिए तुमको चाहिये कि जहा
तक हो चन्दा वसूल करो । आठ दिन पीछे लखनऊ जाएंगे। अब हमारा शरीर कुछ अच्छा है।” १७ सितम्बर सन् ७१।।

शाहजहांपुर । दयानन्द सरस्वती ।
यहा से ही स्वामी जी ने संस्कृत पठन-पाठन सम्बन्धी पुस्तकें**बनानी आरम्भ की और उनकी सूचना एक विज्ञापन

द्वारा साधारण जनता को दी।

लखनऊ पधारे(१८ सितम्बर, सन् १८७९ से २३ सितम्बर, सन् १८७९ तक)–स्वामी जी शाहजहांपुर से १७
को चलकर १८ को लखनऊ आ विराजे और केवल छ: दिन यहां रहकर फर्रुखाबाद चले गये । वे स्वयं एक पत्र में लिखते
हैं-“हम १८ सितम्बर, सन् १८७९ को सायंकाल को शाहजहांपुर से लखनऊ आये और ता० २४ सितम्बर, सन् १८७९
बुधवार के दिन प्रात:काल कानपुर को जावेंगे और वहां से उसी दिन फर्रुखाबाद को जावेगे और वहां एक सप्ताह या दस
दिन ठहर कर फिर कानपुर आएंगे। फिर यहां दो-चार दिन ठहर कर प्रयाग, मिर्जापुर, काशी होते हुए कार्तिक पूर्णमासी तक
दानापुर पहुंचेंगे। अब हमारा शरीर पहले से अच्छा है।*दयानन्द सरस्वती। २१ सितम्बर, सन् १८७९ लखनऊ ।

फर्रुखाबाद का वृत्तान्त
(२५ सितम्बर, सन् १८७९ से ८ अक्तूबर, सन् १८७९ तक)
स्वामी जी २४ सितम्बर, सन् १८७९ को लखनऊ से चलकर २५ सितम्बर सन् १८७९ वृहस्पतिवार, आसोज
सदी १०, संवत् ११३६ को फर्रुखाबाद पहुंचे । जब तक स्वामी जी रहे प्रतिदिन ५ बजे शाम से ७ बजे शाम तक व्याख्यान
होता रहा। जिले के शासक, अधिकारीगण, मुहल्ले वाले, रईस और साहूकार आदि हारों मनुष्यों की भीड़भाड़ रही। २
अक्तूबर, सन् १८७९ को स्वामी जी ने ला० जगन्नाथ प्रसाद रईस फर्रुखाबाद के मकान पर एक व्याख्यान दिया। शुद्ध
हृदय, सत्पुरुष बड़े प्रेम से व्याख्यानों को सुनकर आनन्द में मग्न होते थे परन्तु कुमार्गगामी और वे लोग जिन की नाना प्रकार
के छल कपट धोखे आदि हजारों स्वागसे जीविका चलती थी,कढ़ते थे और समाज से बाहर निकलकर स्वामी जी के
व्याख्यान का अर्थ कुछ का कुछ सुनाते, और लोगों के हदयों में प्रकट म उत्पन्न करते थे। उदाहरणार्ध स्वामी जी ने।
किसी व्याख्यान में कहा था कि आजकल के प्रशासन में गाय-बैल आदि मारे जाते हैं; इस से इस देश के रहने वालों को
बड़ी हानि होती है। देखो ! एक अच्छी मोटी ताजी गाय को यदि लोग मारेंगे तो अधिक से अधिक बीस मनुष्यों का पेट
भरेगा वह भी तब, जब कि उसके साथ दस सेर अनाज भी हो और जो उस की रक्षा करेंगे तो वह कम से कम बीस वर्ष तक।
जीयें, तो देखो ! इस से कितना लाभ होगा अर्थात कम से कम वह दस बार जनेगी और उस के दूध की औसत पाच सर।
प्रतिदिन होगी और (एक) वर्ष तक देगी तो अठारह हजार सेर दूध होगा। इस में प्रति मन पांच सेर चावल डाल कर खीर
बनावेंगे और एक मनुष्य एक सेर खावेगा तो दूध से १२८३० मनुष्यों का पेट भरेगा; उसी गाय से कि जिसका