ची मतवादा पास गया । या देखा है। हाथ में – शीरा हुए वह वहीं खराटा रहा है।
को देखते ही वह योल उठा आ30, वडो | गणेश्वर । तर गाव। जी तुम मा यही भेजा। अब तुम 9
आओ और बहुत देर मत लगाओ ।”

सारांश यह कि इसी प्रकार ९९ मत वादियों के पास गया। राम राय की भटियाना के रमन संग ताल
करने और अपने-अपने घरों में बुलाने

फिर अन्तत: वह उस से मत वाले के पास गया और अपना अभिप्राय प्रकट किया । वह बोला कि भाई गुना,
मविति का प्राप्त करना खाला जी का घर नहीं है। केवल एक अद्वितीय परमेश्या वा ध्यान करने और ठरमें परम प्रीति ने
से ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है अन्यथा तो इन श९ पथभ्रष्ों के समान धकके खाते हुए फिरना है।

अंततः जब वह व्यक्ति राव के पास हो गया तो अपने मन में यह रोचकर कि विचित्र बात है, कहता है अपनी
ही-सी कहता है,घबराता हुआ पंडित जी के पास आया और विस्तारपूर्वक सब वृत्तान्त कहा। पंडित जी ने कहा कि एक बार
फिर जाकर प्रत्येक से पूछो कि आप का धर्म क्या है ?

आप का धर्म क्या है ?-वह व्यक्ति जब फिर गया तो कोई कहता है कि श्री रामचन्द्र साक्षात् परमेश्वर हैं । श्री
रामचन्द्र की भक्ति करना परम धर्म है । कोई कहता है कि लाल-लंगोट वाले की लालसा में सब दिन मस्त पड़े रहना धर्म ।
है। कोई कहता है कि माखन के चोर, गोपियों से कलोल करने वाले की शरण आना धर्म है। कोई कहता है कि वरस पीकर,
धतूरे का दम लगा कर, भंग का लोटा चढ़ाकर, भोले की याद में मग्न हो जाना यही ठीक धर्म हैं। कोई कहता है कि
मुफ्तखोरों को खिलाना, घन भेट में देना यहां तक कि ली तक भी दे देना धर्म है। कोई कहता है कि गंगा मैया, जमना मैया,
सरस्वती इत्यादि में अबकी लगाना धर्म है । कोई कहता है कि कथा का कराना और अच्छे- अब्छे द्रव्य पदार्थ ब्राह्मणों को
देना धर्म है । कोई कहता है कि खूब तान कर कण्ठ तक मद्य पीना, मछली और कलिया (पका हुआ मांस) खाना और फिर
डट कर व्यभिचार करना, यही परम धर्म है। इसी प्रकार कोई जलसिह, कोई सूरजसिंह, कोई तुलसीसिह, कोई पीपलसिंह,
कोई मथुरासिंह, कोई काशीसिंह, कोई राम सिंह, कोई गणेश सिंह, कोई भैरोंसिंह कोई गंगासिंह, कोई शहीदसिंह, कोई
गाजी सिंह, कोई पीरसिंह, कोई सिंह, कोई मुर्दा सिंह, कोई मदारसिंह, कोई भूतसिह, कोई चुडैलसिंह,कोई मसानसिंह, कोई
जिन्न सिंह, कोई पत्थरसिंह, कोई कागज सिंह आदि को पूजना धर्म बतलाता है। कोई कहता है होली घोस्ट (Holy ghos)
और ईश्वर के इकलौते बेटे पर ईमान लाना धर्म है । कोई कहता है कि रसूल पैगम्बरों को मानना, जहाद (लड़ाई) करना
यही धर्म है।
सारांश यह कि इसी प्रकार सबने अपने-अपने धर्म बतलाये । प्रत्येक मनुष्य के मुख से नये ही धर्म सुनकर यह
व्यक्ति स्तम्भित-सा हो गया और सब से पूछकर पंडित जी के पास आया और सब वतात वर्णन किया तो पंडित जी ने
कहा कि अब देखो, इन सब में से सच्चा धर्म तुम को बतलाता हूं। ध्यान से सुनो। देखो | जब एक बात के सच होने पर
चार मनुष्यों की साक्षी एक समान भुगत जाती है तो शासक जान जाता है कि यह बात सच है और जब एक बात पर निन्यानवे
लोगों की सेक्सी हो तो उसके सच होने में क्या सन्देह है? तो बस, जब एक मनुष्य अपने धर्म की बात बतावे और उस को
निन्यानवे मनुष्य मिथ्या कहें तो उस को किस प्रकार माना जावे? कदापि नहीं। उदाहरणार्थ-यहां एक व्यक्ति ने कहा कि
पत्थरों को पूजना धर्म है । इसपर निन्यानवे मनुष्यों की साक्षी हुई कि नहीं यह झूठ है। इसी प्रकार दूसरे ने कहा कि ईसा
पर विश्वास लाना धर्म है, इस पर भी निन्यानवे लोगों ने विरुद्ध गवाही दी, तो उसको कदापि न मानना चाहिये। तीसरे ने
कहा कि मुहम्मद साहब का मानना धर्म है परन्तु शेष सब ने विरोध किया कि यह झूठ है तो समझना चाहिये कि ये सब
अपने मत के लोगों की सेना एकत्रित करने वाले हैं।