पं० अंगद शास्त्री की ओर से स्वामी जी के पत्र का उत्तर
जय जय त्रिजटा परमात्मने नमः श्रीयुत दयानन्द सरस्वती समीपे स्वमत कुशलपूर्वक मद्विज्ञापनम् ।।

आपका पत्र ३ ॥ बजे मेरे पास पहुंचा । लेखाशय प्रकट हुआ ! आपको ऐसा नहीं चाहिये। कभी कुछ लिखना
और कभी कुछ।’ या तो स्वामी जी प्रज्ञाचक्षु के मत पर होना चाहिये जिसका आप अपने पूर्वपत्र में स्वीकार कर चके हैं
जिस परम्परा से शास्त्रार्थ होते हैं, उस बुद्धि से कीजिये, हम तैयार है। तीन स्थान जो निणत हैं उनमें से किसी पर
जाओ । मिति आश्विन कृष्णा १३ । रविवार, संवत् १९३६

फर्रुखाबाद में दिये गये स्वामी जी के व्याख्यानों का सार
उस दिन स्वामी जी ने सत्यधर्म पहचानने और जानने का एक ऐसा रोचक और ठीक उदाहरण दिया कि उस
का जानना प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यक है।

स्वामी जी ने कहा कि एक मनुष्य जिस ने अभी तक किसी धर्म को स्वीकार नहीं किया था, एक पंडित के पास
गया और कहा कि महाराज ! मैं किसी एक धर्म जो सच्चा हो और जिस से मोक्ष मिल सके, स्वीकार करना चाहता हूं। कृपा
करके बतला दीजिये कि कौन-सा धर्म सच्चा है? पंडित जी ने कहा कि चलो, तुम को सच्चा धर्म बतला दें। पंडित जी उस
व्यक्ति को एक ऐसे स्थान पर कि जहां सौ मनुष्य विभिन्न मतों के बैठे हुए अपने-अपने मत की बड़ाई और दूसरों के मत
की बुराई कर रहे थे, ले गये और कहा कि तू प्रत्येक मनुष्य से प्रार्थना करता चल कि मैं एक सच्चे मत को स्वीकार करना
चाहता हूं और आप कृपा करके बतला दीजिये कि कौन सच्चा है?
वह व्यक्ति पहले एक मत वाले के पास गया और यह बात कही। वह मतवादी बोला-कि आइये, आइये बैठिये,
मैं अभी आपको सच्चा मत, जिससे आप झटपट मुक्तिमार्ग को प्राप्त कर लें, बतलाता हूं । सुनो, यह केवल एक मेरा मत
तो सच्चा है और शेष देखो, ये ९९ जो तुम को दिखाई देते हैं, सब झूठे है। इन की एक न मानना, आओ शोध मेरे मत में
हो जाओ वह व्यक्ति बोला कि औरों के पास भी तो हो आऊं । देखं वे क्या कहते हैं।
दूसरे मतवादी के पास गया तो वह चिल्ला कर दौड़ा-आओ ! भाई, बैठो ! तुम यदि मुक्ति चाहते हो तो मेरा
मत शीघ्र स्वीकार कर लो। मेरे मत में होते ही जहां एक कलमा पढ़ा, तत्काल मुक्ति हुई और शेष जो ये ९९ वैठे हैं, सब
झूठे हैं। इनकी बात कदापि न माननी चाहिये ।”

तीसरे मतवादी के पास गया तो वह-यह समझकर कि खूब जाल में फंसा है, बच्चा जावेगा कहां, घर बैठे शिकार
मिलने लगा है; अपने मत की प्रशंसा करने लगा, देखो ! एक मेरा ही मत सच्चा है और शेष ९९ सब झूठे हैं। केवल एक
मेरे ही मत से मुक्ति हो सकती है, दूसरे के से कदापि नहीं ।’ ऐसी बातें कह-कह कर उसको फुसलाने लगा।

1 स्वामी जी ने तो कहीं ऐसा नहीं किया । यह पण्डित जौ की समझ का गुण है । पाठक स्वयं देख लें कि कहीं ऐसा हुआ है।

2 हमको तो जो विधि परम्परा से सज्जन पुरुषों में शास्त्रार्थ की विदित थी जिसके अनुसार लिख रके । अब पण्डित जी वह विधि
यादें जो परम्परा से शास्त्रार्थ हो और परम्परा की विधि वही है जो पण्डित जी ने लिखी तो हमारा दर ही से दंडवत है। हम ऐसे गल-गपाहे ।
के स्थान से घबराते हैं ।

1.क्या कुश्ती है?—बख्तावर सिंह