आपने तीसरी चौथो दफा का अद्भत आशय लिखा है कि उभय पक्ष के षचा मनुष्य बिना टिकट सभा में प्रवेश
न करे । इसका क्या प्रयोजन है? जहां कहीं सभा होती है यह विलसण नियम कहीं नहीं होता है। यहां भीडा चांदपुर की
सभा में आप भी मौजूद थे। किसी को आने जाने का प्रतिबन्ध न था । लज्जा का परित्याग कर निर्णय होना वेद शाख
विरुद्ध है। लज्जा का स्वीकार कर मनुष्य १ १५ अनेक महीनों की अवधि और दिन-प्रतिदिन तीन घंटे शाख्ार्थ
होने से यह निश्चय होता है कि केवल हील-हुज्जतो मेरी रुखसत के दिन व्यतीत करना है मेरी ऐसी है तो पीलीभीत।
बलिया । न्यायानुसार सत्कार का शास्त्रार्थ करूंगा। आप सर्वत्र आते जाते हैं वहां जाने में क्या बंधन है? आपके पत्र में
भाषा के हो शब्द अशुद्ध हैं क्या संस्कृत । आश्विन कृष्ण द्वादश्याम् शनैश्वरे, संवत् १९३६ तारीख १३ सितम्बर,
सन् १८७८ ।

हस्ताक्षर अंगद शास्त्री

स्वामी जी की ओर से पंडित अंगद शास्त्री के उपर्युक्त पत्र का उत्तर
ओ३म् नमः सर्वशक्तमते जगदीश्वराय श्रीयुतांगदशास्त्र्यादिपडितान्प्रतीदप्रख्यानम् ।।

संवत् १९३६ आश्विन कृष्ण १२ शनिवार का लिखा तुम्हारा पत्र आश्विन कृष्णा १३ रविवार को दिन के ११ ॥
बजे मेरे पास पहुंचा। पत्रस्थ लिखा अभिप्राय सब प्रकट हुआ। मुझको अति निश्चय है कि तुम लोग शास्त्रों का विचार
करना कराना तो तब जानोगे जब तुम्हारे अनेक जन्मों के पुण्य उदित होंगे परन्तु जो मैं तुम्हारे निश्चय किये स्थानों में
बातचीत करने को आऊं तो तुमको हल्ला गुल्ला करने का अवसर अच्छा मिल जावे। अब जो तुमको पूर्वोक्त पचास
धार्मिक बुद्धिमान् रईसों के साथ यहां आकर कुछ कहना सुनना हो तो में आने से रोकता नहीं । आगे तुम्हारी प्रसन्नता।
संवत् १९३६ । आश्विन कृष्ण १३ रविवार।

1.यह नियम तो विलक्षण नहीं प्रतीत होता परन्तु निस्संदेह यह विलक्षण है कि शास्त्रार्थ में अपने और पराये सब चले आवे ।
वहां लट्ठबाज खां, मनचले खां, भांग खां, धतूरा खां, चरस खां आदि को एकत्रित करने का क्या प्रयोजन है? जहाँ कहीं सभा होती है यह
विलक्षण नियम कहीं नहीं होता । यह शास्त्रार्थ क्या प्रत्युत एक अखाड़ा है। खेद है कि पण्डित जी श्रोताओं की संख्या निश्चित करने से
गाते हैं । पंडित जी के इनकार से स्पष्ट प्रकट है कि यदि श्रोताओं की संख्या निश्चित हो गई तो हथेली पौटने और देले बरसाने को कोई
नहीं मिलेगा । पंडित जी का वास्तविक प्रयोजन सिद्ध न होगा।

2. खेद है कि पंडित जी लज्जा से अभिप्राय भांडों और रासधारियों के तमाशे से समझे । सच बात सच और झूठ को झूठ कह
देना, इस में क्या लज्जा है।

1 पाठक स्वयं जान लेंगे कि किस की ओर से हीले (बहाने) और ुज्जतें हुई ।

4. यहां तो पण्डित जी एक दिन भी स्वामी जी के न आये । सब प्रकार से स्वामी जी की हानि ही हानि पर कमर बांधे रहे।
वहां ले जाकर न जाने क्या-क्या करेंगे। भला स्वामी जी कब ऐसी पट्टियों में आने वाले है?
5.पण्डित जी प्रकट करें कि कहां-कहां कौन-कौन अशुद्धियां हुई हैं। वेसे ही अटकलपच्चूलिख देने से क्या होता है? पण्डित
जी के पत्र में जो शादियां थी,जहां तक हो सका हमने प्रकट की । शेष पाठक स्वयं जान लेंगे । रही स्वामी जी की वे पण्डित जी बतलावें ।
ो अशुद्धियां इस चिट्ठी में पहली चिट्ठी के समान हैं, वे पाठक स्वयं देख लें । उनकी चिट्ठियों के शब्दों की नकल जैसी की तैसी टिप्पणियों
दे दी गई है। देखिये के मैं को’ आदि शब्द कितने अशुद्ध लिखे हैं? लेखक-बख्तावरसिंह