पता-जवाहर बुक डिपो ( १२ )
भारतीय प्रेस, मेरठ
हमें देओ दिखाई, तुम जादूगरनी नार ॥२॥
नहीं हरगिज तुम्हें बरेंगे, थारी राजी नहीं करेंगे।
सिर फोड़ मरेंगे, मत करो हम पर प्यार ॥३॥
हमें लाई जहां से ठाकर,वहां अवो तुम पहुंचकर।।
नहीं फिर पछताकर खावोगी बहुत सी मार ॥४॥
लहर-देरअवमतनातुमलाओ,हमेंदलअन्दरपहुँचाओ,पिताजोसुन
लेयगाम्हारा,थारीमारउड़ादेखालभूल जावोपेमप्यारसारा।
तोड़-पर पुरुषों पर चित्त डिगा तुम्हें जरा शर्म नहीं आती ॥१॥
लावणी–चंदनिया और चुनिया बोली,जो ज्यादा इतराओ गे।
तो कल को दोनों देवी की भेट चढ़ाये जाओगे ॥
झूलना-मत ज्यादा जीभ चलाओ, क्यों विरथा हमें डराओ।
तुम नाहक मारे जाओ, देवी के मठ में जायके ॥
है जो कोई पिता तुम्हारा, वो कर क्या सके हमारा ।
जादू का भरा पिटारा, सबको पत्थर देय बनायके ॥
ये देश कामरू म्हारा, है जादू का भन्डारा 1
नहीं जोर चलेगा थारा, जादू के सम्मुख आयके ॥
तुम जो चाहो जिन्दगानी, म्हारी होगी वात पुगानी।
हम कर लेंगे मन मानी, थारा सिर काटें रहंसायके ॥
दोहा-किशनलाल कहने लगा क्यों देती हो डांस ।
थारी हट होगी नहीं चाहे सिर को काट ॥
ख्याल-चाहिए सिर को काट, तुम्हारी नहीं डाट में आवेंगे।
प्राण रहें या जाय मगर नहीं तुमको जान बनाएंगे ॥
संगलदीप जाय धीरा की चारों शर्त पुगावेंगे।

होली नल पुराण
की नल पुराण (१३) किशनलाल को ब्याह
ती धीरा की कन्या, उसको हम बनाएंगे ।
दोहा-फिर दोनों ने हर तरह लिये कुमर समझाय ।
एक न मानी बात तब उठी बहुत रिस खाय 1
बन्द–लाचार हो दोनों कु वर झट कैद फौरन कर लिये।
इक कोठड़ी में बन्द कर ताले अगाड़ी जड़ दिये ॥
अब हाल ही का सुनो, उगी कला जव भान की।
सब असर जादू का घंटा आँख खुलीं हर जुवान की ।
जिस ठौड़ सोवे थे कुंवर मनसुख उधर तकने लगा।
खाली पड़े देखे पलंग फिर गौर से लखने लगा ॥
चौक-सुत कहीं नजर नहीं आये,सव दल अन्दर ढूँढने।
सब सुन सुन कर घबराये, सुन नल ने दुखड़े पाये ॥
आल्हा-हल्लालोकू मचादलअन्दर इधरउधरको दोड़ेजुवान।
कोई पैदल कोई अश्व सवारी भगे सेकड़ों सांडीवान ॥
वन परवत झाड़ी सब टुडे मारा छान सभी वीरान ॥
ढूंढता सब दिन का कहीं चलाना पता निशान ॥
सांझ हुई दिन छिपा गगन में हुआअस्त पश्चिम में भान॥
हो लाचार फिरे सब उल्टे गये नदी प दल दरम्यान ॥
हाहाकार मची दलअन्दर बात गयी तो कष्ट महान ।
ओंधे मुह नल गिरा धरने पर आंसू बरसे मेघ समान ॥
भजन समाजी-करता मेरे रे कहा ठठी भगवान ॥टेक॥
नल रो रो बोला तानी, नयनों से बरसे पानी ।
मेरे विधना कैसी ठानी, इन पदेशन दरम्यान ॥१॥
अब मैं क्या जतन बनाऊं किस विध कुमरों को पाऊं।
कैसे उनका पता चला है वियावान वीराना