पता-जवाहर बुक डिपो ( १० ) भारतीय प्रेस, मेरठ।
दिन छिप गया हुआ अंधेरा, दे दिया नदी पर डेरा ।
रजनी को करें बसेरा, तड़के चलें खब ससतायके ।
दोहा-खान पान कर सो गये, छत्री पांव पसार ।
पहर पर मनसुख हुआ, ले कर में तलवार 0
ख्याल-नल जब कहने लगा मनसुख से,देश कामरु है भाई।
विद्या का भन्डार दूर तक, जादू की शौहरत छाई॥
जादू टोना करना यार हैं यहां की चचल दुखदाई
रहना तुम हुशियार यार,कभी पड़े भुगतनी कठिनाई॥
दोहा-यहां की चरचा यहां रही आगे सुनो वयान ।
दुर्ग का एक भजन था, उसी वनी दरम्यान ।
छन्द-देवी कमच्छा का वना था भवन उस मैदान में ।
रहती थी दो जादू भरी लड़की उसी वीरान में ॥
पूजा करें थी चन्डका की भवन में नित जायके ।
प्रसन्न होकर चंडिका देवी दरस नित आयकर ॥
जादू भरी पुतली दोउ चुनिया चन्दनियां नाम था।
थीं जाति की बेड़नी जादूगर का काम था u
चौक-चल कर मंदिर में आई, फल फूल भेट मे लाई ।
कर पूजा मन हरषै, मन्दिर में धोक लगाई ॥
आल्हा-हो प्रसन्न अम्बिका बोली सुन चन्दनियां कानलगाय॥
मंशा-पूर्ण हो गई थारी विध ने कारज दियो बताय॥
जिसे करना तुम चाहे थीं जो विधना ने दिये मिलाय ॥
घर आये नाग न पूजे बिरथा वं पूजने जांय ।
घर बैठे तुम लायक वरना म्हारी गये बनी में आय ।
अब मत देर करो तुम बेटी उड़न खटोला लेवो मंगाय ।

डटी वरात नदी के कांठे सब पर जादू देओ भुलाय ।
पहरेदार तलक सो जाव सुद बुध रहे बदन की नाय।
भजन समाजी-मठ से धाई” रं जादूगरनी ,नार ।टेका
जव उड़न खटोली लाई’, दोउ उस पर चढ़कर धाई’ ।
चल दल के धोरे आई, जहां मनसुख पहरेदार ॥१॥
जब ऐसा जादू मारा, दल वेसुध सोया सारा ।
से
मनसुख भी बाजी हारा, हुआ जादू लाचार ॥२॥
दोऊ वरना अचक उठाये, पलंग पर तुरत लिटाये ।
नहीं भेद किसी को पाये, दिया जादू ऐसा मार ॥३॥
जब ले कुमरों को धाई* चल अपने घर पर आई* ।
नहीं फूली अंग समाई, करती कुमरों पर प्यार ॥४॥
भजन हरियाणा–जगाकरकुमरोको,जवजादूगरनी बोलीं ॥टेक॥
हुये पूरण भाग हमारे, जो दर्शन मिले तुम्हारे ।
हमें तुम जी से प्यार, थारे काज रात भर डोलीं ॥१॥
दुरगे की सेवा कीनी थारी सूरत जब ये चीनी ।
खबर अम्बे ने दीनी थारी जाकर शिकल टटोली ॥२॥
तुम दीखो दोनों भाई, और हम दोनों मां जाई ।
राम ने जोट मिलाई, भली किस्मत म्हारी खोली ॥३॥
तुम हम दोनों को वरना, हमें अपनी प्यारी कर लो।
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वचन घर अन्दर भरलो, कहीं वात जाय ना खोली ॥४॥
भजन रंगत वाणी-सुन बोल रसीले बोले राजकुमार ।टेक।
तुम कौन हो सांच वदावो,म्हारे दिल का भरम मिटावो।
किसे पति बना, क्यों धरी शरम उतार ॥१॥
क्यों हमें उठाकर लाई तुम जरा नहीं शरमाई