पता-जवाहर बुक डिपो (=,
घोड़ा शुतर रथ पालकी. घुड़साल गज मस्तान थे।
हथियार और राशन भरे छकड़ों में सब सामान थे I
नल के दलों में जिस घड़ी बाजा बिगुल झड़ लायकर।
कायर भजे तज नौकरी शूरा सजे हरपाय कर
चौक-दल नल गरबे के साजे, रणसिंघा रण में बाजे।
कायर तज दल को भाजे, शूरा घन समान गाजे ॥
भजन लंगड़ा-सजे दल नरवर के जोधा कछुये रे ॥टेक॥
सेला बांधे जरी के पहरी कुलै कवाय, रंग बिरंगे जांगिये
घुन्डी जड़ी सिहाय । वू ट पहने अछाये रे ॥१॥
अस्त्र शस्त्र सब जड़े सितार तुपक कृपाण, फरसा ढाल
कटार ले सजे रंगीले ज्वान। सेल जब कर में ठाये रे ॥३
उधर महल में उबटना मले नगर की नार किशनलाल
बरना बना महलों पड़ी सिंगार। गीत सखियों ने गायेरे॥३
रत्न जड़ित सिर सेहरा,मुतिया जड़ींकबाय। मणिमाणिक
जड़ा मोड़ में शोभा बरनी न जाय॥रूपलखशशि शरमायेरे॥४
लहर-हाथमें कंगन बंधवाया,जड़ा रतनोंसे अछवाया,दुमैंतीमन
में हरषाई,गुरु भीमसेन यों कहें बना को दुद्धी जब प्यार u
तोड़-चन्दन कहै भजन कर बंदे,तेरी अमर रहे ना काया ॥४
दोहा-ढोला जब कहने लगा सुन तू माता वात ।
मुझको भी बना बना, कंगन बांधो हाथ ॥
गाया-एजी बोला ढोला,मात मुझे बना बनादे। किशनलाल
की तरह हल्दी मोपे चढ़ा दे,रत्नजड़ित सिर मोर हाथ
काना बंधवादे। कियनलालकी भांतमूझेभी दुद्दी*याद।
और उबटनमल मेरे गात। जाऊं संगलदीपकोरी भाईका

करू गावरान।सोरी दोनों भाईवरना वनकर जायेंगे
दोहा-ढोला की ट देख कर हुई दमिन लाचार ।
हलद चढ़ाई कुंवर पै मंगल गावे नार ।
भजन वरना-दोनों दशरथ के से छिनार हमारे ये वन॥टेक
दोनों की उमर है थोड़ी, जने राम लखन की जोड़ी ।
ये फूलों कैसे दौना री, हमारे ये वना ॥१॥ दोनों०
दो चांद सूरज से दमके कंगनों में हीरे चमके ।
इन्हें नजर लगेगी क्योंना री हमारे ये बना ॥२॥दोनों
ये संकलदीप को जावें, वरनी व्याह के जावें।
मिल जाय कांच में सोना री,हमारे ये वना ॥३॥दोनों०
वहां जादूगरनी नारी बड़ी चंचल सौक हमारी ।
कर देंगी जादू टोना री, हमारे ये वना ॥४॥ दोनों०
दोहा-दोनों वरना हो गये सज वजकर तइयार ।
इतने ही में आ गया सजकर गज नल द्वार ॥

होली खेल-चली गज बज छैल बराती ॥
लावणी-धौंसा वाजा मंझा सुतका सुन सुनकर सब रहस्य।
लाखा पांडा और दोउ वरना हाथी ऊपर वैठाये ॥
झूलना-नल सनमुख हुये तैयार,जड़ करके पांचों हथियार।
घुड़ली पे हुये सवार, धाये ईश्वर का गुण गायके ॥
चले दल वादल से भाई कुछ तका ना कुवा खाई।
नरवर से सेना धाई, जब मुख से राम मनायके ॥
मग में कई दिवस विताये, चल देश कामरु आये
जब दिल ने दिल ठहराये, एक नदी किनारे जायके ॥