पता-जवाहर बुक डिपो ( ४ ) भारतीय प्रेस, मेरठ
लावणी-ब्राह्मण नाई बैठे देखे, नल ने घोड़ा ठहराया।
कूद पड़ा घोड़े से छत्री नागिन के धीरे आया ॥
झलना-जब नलने वचन सुनाये, कहो कौन दिशा से आये।
तुम भूखे और पिसाये, क्यों पड़े वनी में आयके ।
जब नेगी वोले बानी, सब वरनी बिपत कहानी ।
म्हारी संकलदीप राजधानी नीरज राज का रहस्य॥
वहां का धीरसिंह बलकारी,घर जिसके कन्या कुवारी।
उसने ये विपता डारी, राजा सुनलो कान लगायके ॥
हम सिक्का उसका लाये, सब भूपन पै फिर आये ।
नहीं किसी ने हम ठहराये,धक्के खाये खुवा घायल ।
दोहा-दई पत्रिका भूप ने कठिन शर्त लिखीं चार ।
उन शरतों को पढ़ नृप गये सब हिम्मत हार ॥
ख्याल-इतनी बात सुनी नागिन की कहन लगा नल बजाई।
क्या क्या शर्त लिखीं धीरा ने, हमको दिखलाओ भाई॥
चिट्ठी ले करके नागिन से रांची सारी कठिनाई ।
चारों शर्त बांच धीरा की पूजा और ब्राह्मण नाई ॥
दोहा-नरवर गढ़ क्यों ना गये तुम नल के दरबार।
टीका लेता हरदा कर शत पुगाता चार ॥
छन्द-इनकार धीरा ने किया, मत पांव नरवर में दीजियो ।
नल जाति से हीना पड़ा टीकी न हरगिज कीजिये॥
इस काज हम पहुँचे नहीं नल नल के दरवार में ।
बाकी लिये सब देख हमने वीर वारो पार में u
हारे थके यहां टिक गये फल खाय कुछ मसतायेंगे ।
परभात उठकर नृप जी निज देश को हम जायेंगे

चौक-सुन कर नेगी की बानी, गया भबक शेर वाली ।
है धीरसिंह अज्ञानी, मधमाती शठ दहकानी ॥
भजन लंगड़ा-चलो अब नरवरको तुम ब्राह्मण नाई रे ॥टेक॥
क्यों धक्के खाते फिरो मुल्कों में बेकार। चलो म्हारे साथ
तुम मतना करो अवार ॥ कहीं मुझ नल वलदाई रे ॥१॥
नल मेरा ही नाम ह नरवर गढ़ भोपाल। पुष्कर भाई का
कुमर है लड़का किशनलाल। उसी की करो सगाई रे ॥२॥
नल के सुनकर नाम को खद हुआ मन माह । हम नरपर
जायेंगे नहीं नेगी कर गये नांह, कौन सिर धरे बुराई रे ॥३॥
नागिन को नल ले गया जबरन अपने साथ, आगे २ कर
लिये कोड़ा लेकर हाथ । नहीं कुछ पार बसाई रे ॥४॥
लहर-सभा में चल नेगीआये,न्हवाकर भोजनकरवाये । सभाजहां
लागीझड़झड़के,जुड़ानलकासबदरवारशूरजहांबैठेअड़अड़के
तोड़-हलकारा भिजवाकर नलने भाई पुष्कर वेग बुलाया ।२
लावणी-संकलदीप धीर सिंह राजा वहां से टीका आया है।
किशनलाल का सिक्का ले लो ये मेरे मन भाया है ।
झूलना-फिर चारों शर्त सुनाई चिट्ठी में लिखी लिखाई।
सुन पुष्कर कर गया नाई, लगा कहने नाड़ हिलायके ।
न हम ये टीका लेंगे, नहीं पांव उधर को देखेंगे ।
हम नाहक विपत सहेंगे, उस संकलदीप में जायके ॥
नहीं उसकी शर्त पुगानी, फिरें मरते मौत बिगानी ।
क्यों ख्वार करें जिंदगानी,क्या लेयेंगे व्याह रचायके ।
कोई अपने मेल का भाई, लेंय ड ड करें अशनाई।
उस नरसिंह घर जाई, मानस खानी कन्या आयके