होली नल पुराण नवां भाग
किशनलाल का ब्याह

संकलदीप की लड़ाई
चौ० चंदन सिंह पीपल के निवासी कृत

ईश्वर प्रार्थना

दोहा-अजर अमर सुख मूल जग पालक जग भूप ।
सहस्त्र जबां से शेष को कह नहीं सकते रूप ॥
ख्याल-कथ नहीं सकते रूप हजारों कवि मार सिर हार गये
शिव ब्रह्मा और उमा शारदा गति से हो लाचार गई।
जो मोती से बंधे भजन कर,सजन निधि से पार गय।
बिन समझे मतिमन्द फन्द में फंस जग से बेकार गये ।
भजन-इस जग गुलशन का माली तू करतार ।टक1
इस चमन का तू है माली, हर जगह तेरी हरियाली ।
कोई जगह न खोली, फूल मूल फल डार ॥१॥
ये माया रूपी बगीचा, खुद माली बनकर सींचा।
कैसा नक्शा खींचा, पाया ना किसी को पार ॥२॥
तेरी अजब अनोखी माया,नहीं भेद किसी को पाया।
जिने मन से धाया, दिया वो निध से तार ।३
जो तेरा नाम सुमरता, भव भागर पार उतरना।
नित सुमरन करता, चन्दन निपट गंवार u।

पहली मंजिल *
दोहा-कर वन्दन वन्दन करू कृपा करो भगवान ।
किशनलाल को ब्याह का गीत धर करू वखान॥
ख्याल-संकल दीप दीप एक भारी, धीरसिंह की राजधानी ।
चन्द्रवती युवती राजा की, वारी सुता हुई सयानी ॥
एक दिना गये भूप महल में, हाथ जोड़ वोली रानी।
चन्द्रवतीहुई व्याह योग,पियातुमने अबतक नहीं जानी॥
दोहा-रानी के सुंदर वचन, हुआ नृप का ज्ञान ।
महलों से दया तभी गया सभा दरम्यान ॥
होली टेक-चल भूप सभा में आया u
ला०-धीरसिंह ने जाय सभा में बुलवाये ब्राह्मण नाई।
याने स्याने किये इकट्ठे, घड़ी मुहूर्त दिखाओ ॥
झूलना-टीके को किया सामान, कुछ दिये जरी के थान
एक रतन जड़ित कृपाण,जुदाई नागिन को लाया ॥१॥
एक सहस अशरफी भाई, जो भेंट काज पकड़ाई ।
समझाये ब्राह्मण ने, जब अपने पास बुलाने ॥२॥
तुम भरत खण्ड में जाओ, जहां वर घर अच्छा पावो।
वहीं टीका जाय चढ़ावो,किसी अच्छे भूप घर जायके ।२
कोई हो ऐसा बलदाई, करे पूरी शर्त जो भाई ।
जब लड़की जाय बरनाई, करे पूरी शर्त यहां आये के।eu
दोहा-जो तरवरिया छत्री भरत खण्ड दरम्यान ।।
चार शर्त पूरी करे दू लड़की का दान ।
ख्याल-पहली शर्त पुगावे जो कोई पुल दलदल का बचाव।
जा रात चड़ी चुगल की उसे मार कर गिरदावे

तीजी शर्त बली दानों से, जो कोई बखेर चुगवावे ।
चौथी शर्त नाग नदियों के,उजियाले के हित लावे ॥
दोहा-इन शरतों को आनकर जो पूरी कर देय ।
चन्द्रवती के संग में वो ही भांवर लेय 4
छन्द-लिख पत्रिका जव नृप ने,नेगिन को झट पकड़ा दई ।
सामान ले नेगी चलै, बटिया शितावी गह लई ॥
धीरा बली कहने लगा, नेगी सुनो चित्त लायके ।
जिस भूप घर चाहो करो, टीका सुता का जायके ॥
मत जाइयो नरवर में तुम, ना जात से हीना वड़ा ।
घर खाय टुकड़ा नीच के, हर बात से होना पड़ा ॥
चौक-नल की दमयन्ती नारी, रही भीष्म के घर प्यारी ।
बंगम ने आव उतारी, करी सव तरियों से ख्वारी ॥
भजन लंगड़ा-नृप की सुन बानी, जब नेगी धाये रे ॥टेक ।
ले टीका नेगी चले,नेक न करी अलीगढ़ में घृत
फिरे राजों के दरबार। शर्त पढ़ सब घबराये रे ॥१॥
जूनागढ़ प्रतापगढ़ देखा गढ़ चित्तौड़ । उदयपुर और
जोधपुर देखे सब राठौड़ । किसी ने नहीं टिक येरे।२।
धीरसिंह की शर्त पढ़ घबरा गये नरेश । टीका कोई
लेता नहीं घूम फिरे सब देश11 वहुतसे धक्के खाये ॥३॥
घूमत २ हो गये नेगी तब किलकान। चलते चलते जा
टिके एक बनी दरम्यान ॥ बैठ दोनों ससताये रे ॥४॥
लहर-मिटेनाजोविधनानेचाही,करोकोईलाखचतुराईकु वरनल
मंझाकाजाया,जवखेलनचला शिकारउसीवनके अन्दरआया
नेगी बैठे मिले वनी में जिन्हें देख कंवर रहस्य ।१॥