लोगों के लिए दिया है. अब
हुआ और भली भांति सजा हुआ है। चित्र दर्पण और कछ वस्तुएं असली भी जहां-तहां लटकी हुई हैं। टेबिल जी
कोच, बैठने की वस्तुओं से कमरे सजे है ।दरी, मुंज की चटाई सर्वत्र फैलाई हुई है । अब में इसको दु:ख के साथ वर्ण
करता हूँ कि हमारे स्वामी जी इस समय निर्बल हैं और उन की आकृति और शरीर अपेक्षया उस समय से, जैसा कि हमने
दिल्ली में देखा था, दुर्बल है परन्तु कुछ भय की बात नहीं है। पूछने से विदित हुआ कि संग्रहणी का रोग डेढ़ मास ।
अच्छा हो गया और गत सप्ताह से उनको एक दिन के अन्तर से ज्वर आता है। परन्तु में हप से कहता है कि तo २६
को ज्वार की बारी थी परन्तु न आया। हमने उनसे दानापुर सीधा चलने को कहा परन्तु वे यह कहते हैं कि ‘यदि हम जायेंगे
भी तो भी हम वचन नहीं देते कि नित्य व्याख्यान दे सकेंगे या नहीं और पन्द्रह दिन तक ठहरेंगे। हरिहर क्षेत्र में जाने का भी
वचन नहीं कर सकते । तिस पर हमने उत्तर दिया कि जैसी आपकी इच्छा हो वैसा कीजिये और नित्य व्याख्यान देने की
आवश्यकता नहीं है। रामपुर के बारे में पीछे देखा जाएगा। मैं आशा करता हूं कि इस बात को आप पसन्द करेंगे। अब
मैं पूरा वृत्तान्त लिखता हूँ।

तीन पंडित और एक साधु उनके साथ हैं और एक कहार नौकर है। स्वामी जी को छोड़ कर पांच मनुष्य हुए सो
आप तैयारी कीजिये । एक पलंग निवार का स्वामी जी के लिए और चार साधारण चारपाई औरों के लिए। चूकि स्वामी
जी निर्बल हैं वे आटा, चावल और मूंग की दाल खाते हैं। आप अरहर, उड़द की दाल का भी प्रबन्ध कर रखियेगा । घी को
सावधानता से खरीदकर रखियेगा । परन्तु हम समझते हैं कि उनको अभी इसकी आवश्यकता न होगी क्योंकि वे कहते थे
कि बाजार का घी बुरे प्रकार का और मिलावट वाला मिलता है परन्तु हमने उनको कहा कि हम अच्छा घी खरीद लगे। वे
सहमत हुए हैं। मिर्जापुर से रविवार ‘, ३० अक्टूबर, सन् १८७९ को चलने के लिए उस गाड़ी में जो नी बजकर ३० मिनट
पर यहां से चलती है और कानपुर को उसी दिन साढ़े तीन बजे साय पहुंचती है। इस शर्त पर कि आप वहां भोजन तैयार
रखे क्योंकि यहां से बहुत सवेरे चलकर वहां पहुंचते ही स्वामी जी भोजन करेंगे तत्पश्चात् किसी से भेंट करेंगे। वे चाहते
हैं कि निम्नलिखित पदार्थों का भोजन बनावें, चावल, रोटी, मूंग की दाल और साग, परन्तु मिर्च खटाई न पड़े और रोटी में
घी भी न लगे। पहले स्वामी जी ने कहा था कि पैसेंजर ट्रेन से जो यहा से साढे १२ बजे चलती है और दानापुर साढ़े नौ
बजे रात को पहुंचती है, उसकी फर्स्ट क्लास में चलें क्योंकि उस में शौच आदि की सुविधा रहती है । फिर कहा कि उसमें
पन्द्रह रुपये साढ़े सात आने किराया लगता है जो अधिक है, इसलिए हम डाकगाड़ी की द्वितीय श्रेणी में जायेंगे जिसस
किराया सात रुपया ग्यारह आने न पाई है; और जिसमें शौचालय भी है। इस चिट्ठी के पाते ही आप बाब गलाबचन्द का
बंगला खाली रखिये और जितने सदस्य स्टेशन पर आ सके, रसाढ़े तीन बजे उपस्थित रहें, क्योंकि हम लोग साढे तीन बजे
अवश्य पहुंचेंगे । कृपा करके आप कुछ फल भी रखियेगा जैसे कि अमरूदं शरीफा, केला । कदाचित वे उनको मांगे क्योंकि
हमने इन वस्तुओं को देखा है। अच्छे प्रकार की थोड़ी सी मिठाई भी रखिये परन्तु वहुत नहीं। दूसरा पण्डित भी आने वाला
है आज या कल 1

मिर्जापुर समाज के कोई सदस्य हम लोगों के साथ नहीं जायेंगे सो हम लोग सात मनुष्य आते हैं। मैं समझता हू,
कि मेरे पास रुपया पर्याप्त है परंतु औरों के लिए हमको इयोढ़े दरजें का किराया देना होगा परन्तु दो मनुष्यों को छोड़कर,
जिनको स्वामी जी के सेवकों के रूप में तीसरी श्रेणी का किराया देना पड़ेगा । २८ अक्तूबर, सन् १८७९