माघाता मनी आर्यसमाज दरापर-इन सबको वेद पायका बन्द राखेका अपर। और जिगक पण
जितना कदा होवे जैसराज गोटीराम सहकार तर्कवाद के पास कृपया मेजकर रसीद मंगा ले। मूलती समर्थटान बम्बई
वाले तथा मुन्शी इंद्रमणि जी मुरादाबादी के पास मेरे बने सब दूस्तक मिलेगे।

१४ अक्टूबर, १८७२ कानपुर।

दयानन्द सरस्वती
छाले के वास्ते एक हजार रूपण बाबा से भी है और जब गवाना बनाया गवेगा । तुम
सन् १८७९ ।
भी बम्बई में इसके लिए चंदा करके । हमारा रविवार मार्गशीर्ष तक अपना छापाखाना कर लेने का है । कानपुर । ११ अक्तूबर,

आश्विन बदि ११, शनिवार अर्थात ६ अक्तूबर को यहां से प्रयाग वेगे ।

दयानन्द सरस्वती, कानपुर।
प्रयाग के समाचार १७ अक्टूबर से २२ अक्तूबर तक) स्वामी जी कानपुर से रेत द्वारा आश्विन बदि ११
संवत् १९३६ तदनुसार १६ अक्टूबर, सन् १८७९ को छलका १७ अशा को प्रयागराज पथारे और केवल ६ दिन
विश्राम करके मिर्जापुर की ओर चले गये। कोई विशेष काम नत किया। जो न मिलने आये उनै सत्योपदेश से
लाभ पहुंचाते रहे।
मिर्जापुर का वृत्तान्त(२३ अक्तूबर, सन् १८७१ से २९ अक्तूबर, सन् १८७९ तक)–स्वामी जी आश्विन शुद
९. गुरुवार, संवत् १९३६ तदनुसार २३ अक्टूबर, सन् १८७९ को प्रयाग से मिर्जापुर में पधार का सेठ रामरतन जी केके बाग
में ठहरे। शरीर अस्वस्थ य टो भी परोपकार के बिना चैन पो । कुल तीन व्याख्यान वहां दिये । व्याखयानो के अतिरिक्त
भी प्रत्येक समय लोग आते और अपने संदेह निकट किया करते थे। विस्त वृतान्त इन दो पत्रों में है जो साथ सम्मिलित
है। दानापुर से बाबू माखनलाल स्वामी जी को लेने के लिए मिर्जापुर आये। वे अपने दो पत्रं में यहां का वृतान्त इस प्रकार
सीखते हैं-

*बाबू माधोलाल जी, यहां ५ बजे कल हम पहुंच गये और एक लड़का स्टेशन पर उपस्थित था जिसको बाबू
नैनीताल ने भेजा था। जहां स्वामी जी व्याख्यान दे रहे थे, वहां हम गये और आठ बजे तक ठहरे । तत्पश्चात् स्वामी जी
के साथ उनके डेरे पर गये जो बगीचे में था।

समस्त विवरण में से में सबसे पहले व्याख्यान का वृत्तांत लिखना चाहता है। व्याख्यान का कमरा बहुत बड़ा
और अच्छा था जिसमें बहुत मनुष्य बैठ सकते हैं और बहुत एकत्रित थे । शतरंज और दरी बिछी हुई थी और रोशनी भी
-ब की हुई थी। बीच में एक चौकी रखी हुई थी जिसके ऊपर दरी और तकिया रखा हुआ था, जिस पर स्वामी जी ने
ठीक ६ बजे बैठकर व्याख्यान आरम्भ किया। सब लोग बड़े ध्यान से व्याख्यान सम रहे थे, जो धर्म के विषय में था और
बहुत रोचक था। बाबु ननूलाल उपस्थित न थे क्योंकि आंव की बीमारी से उनको दस-पन्द्रह मिनट में दस्त जाना पड़ता
। शामलात यहां रविवार को आये और फिर उसी दिन बनारस चले गये। उन्होंने स्वामी जी को न देखा जैसा कि उन
7 चाहिये था और स्वामी जी के ले जाने के लिए रहना चाहिये था । इसके बदले में वह यहां से बनारस जाते हैं और आज

– १६ अक्तूबर को आश्विन ) सुदि प्रतिपदा पड़ती है।-संपाठ