कमेटी के सदस्यों के कर्तव्य न्यायाधीश कौन बने ?-फिर समाज’ के स्थान पर पधार कर बाबू दुगा्रसाद
साहब रईस व आनरेरी मैजिस्ट्रेट फर्रुखाबाद से बातचीत हुई। स्वामी जी ने पूछा कि यहां कमेटी के सदस्य कोन-्कौन
है? बाबू साहब ने कहा कि महाराज मैं भी हूं। कहा कि क्या तुम मुकइमों में न्याय करते हो ?

बाबू साहय-हाँ महाराज । स्वामी जी-राजा का काम है कि पक्षपात लेशमात्र भी न करे और अन्याय कभी न
करे । बाबू देव-महाराज मुझ से जहां तक हो सकता है, अच्छी प्रकार छानबीन कर लेता है परन्तु हदय की बात क्योकर
जान सकता हूं? स्वामी जी-जब तक पूर्ण विद्या और विज्ञान और दूसरे के अन्त:करण की बात जानने का सामर्थ्य न होवे,
न्याय करने लगना किसी को उचित नहीं है। यदि तुम्हारा सामव्र्य इतना नहीं है तो न्यायाधीश का काम करते ही क्यों हो?
बाबू साहब चुप रहे ।

फिर व्याख्यान आरम्भ हुआ। इसी विषय पर व्याख्यान भी हुआ । स्वामी जी ने न्याय और साक्षी के विषय में
बहुत कुछ विस्तारपूर्वक उपदेश दिया और अन्त में यह भी कहा कि म्युनिसिपैतिटी का यह प्रबन्ध कि मल को ढेर करा
देते हैं, अत्यन्त हानिकारक है; और इससे बहुत रोग उत्पन होते हैं।

एक दिन फतेहगढ़ में भी स्वामी जी का व्याख्यान हुआ था। व्याख्यान से पहले स्वामी जी ने यह कहा था कि
आर्यसमाज के दस नियमों पर बहुत से लोगों ने प्रत्येक प्रकार की परीकषा की परन्तु आज तक एक शब्द भी उनमे व्यय् न
पाया और न कोई मनुष्य व्यर्थ सिद्ध कर सकता है। व्याख्यान में बहमसमाजियों का बड़ी प्रबल युक्तियों से खंडन किया।
ठीक व्याख्यान के बीच में एक बंगाली या पंजाबी व्यक्ति मद्य पीकर आया और चिल्लाने लगा। ऐसा प्रतीत हुआ कि
किसी का सिखलाया हुआ आया है। लोग उसको धीरे से समझाने लगे। जिस समय स्वामी जी ने उसका शब्द सुना तो
तत्काल एक ऊंचे स्वर से उसे ललकारा। साधारण मनुष्य मौन हो गये उस व्यक्ति का नशा हिरन हो गया और वह स्वयं
भी वहां से भाग गया ।

समाचार पत्र ‘नौरंगे मलामी’ खंड २, संख्या ९ तिथि ३० अक्तूबर, सन् १८७९ शुक्रवार में उस समय का वृतान्त
निम्नलिखित शीर्षक से लिखा हुआ है-

फर्रूखाबाद नगर और कैम्प फतेहगढ़-दस सप्ताह का समय व्यतीत हुआ कि महाराज दयानन्द सरस्वती जी,
घोड़ा गाड़ी द्वारा फर्रुखाबाद में आकर गंगातट पर ला० जगन्नाथ साहब के विश्रान्त पर ठहरे । उक्त महाराज के पधारने
के समय नगरवासियों में से बहुत से लोग उन की सेवा में गये और उनके मधुर वचनों को सुनकर प्रसन्न हुए। इस बात में
बहुत से लोग एकमत हैं कि वे संस्कृत में अत्यधिक दश हैं और मूर्तिपूजा का सर्वथा निषेध करते हैं । उक्त महाराज ने ३०
सितम्बर से एक दिन का अन्तर देकर, उपर्युक्त ला० जगन्नाथ साहब के मकान पर तीन दिन सभा की । इस सभा के विषय
में विज्ञापनों द्वारा नगर के समस्त रईसों की सूचित कर दिया गया था। उनमें से बहुत से सभा में सम्मिलित हुए। ज्वाइण्ट
मैजिस्ट्रेट तथा पादरी स्कॉट साहब भी एक या दो बार पधारे और सभा के आरम्भ से अन्त तक विराजमान रहे । संवाददाता
भी इस सभा में था । वास्तव में उक्त महाराज की वर्णनशैली ऐसी है कि सनने वालों की सुनने से किसी प्रकार तृष्ति नहीं
होती। उनके वचनों से प्रकट होता था कि उनका आचरण वेद के अनुसार है और मूर्तिपूजा जो आजकल लोग करते हैं,
उसके वे विरुद्ध है। बहुत से हिन्दुओं ने उनका अनुकरण स्वीकार किया है तथा अन्य करते चले जा रहे हैं। जब वे वर्णन
करने को बैठते हैं तो प्राय: अच्छी शिक्षा देते हैं और कुछ बातें ऐसी होती हैं जो हिन्दू मुसलमान सब के विरुद्ध होती हैं ।
परन्तु अस्पष्ट को छोड़कर स्पष्ट का अनुकरण करना चाहिये । प्रत्येक सभा में हजारों मनुष्यों की भीड़ होती थी और ऐसा
धक्का-मुक्का होता था कि उसका वर्णन नहीं हो सकता । अन्तिम सभा ला० मदनमोहनलाल साहब के मकान पर हई थी।