क्यों रिन किया । हा पोपतीला में दस प्रजापति वा कश्यप को एक ही सब सन्तान मानने से पशुष्यवहार सिद्ध होता
है। ये माने जाटा रहे ।

चौबीसवां सरल-गायत्री जाप से कोई फल है या नहीं और है तो क्यों है?

उत्तर-गायत्री जाप यदि वेदोक्त रीति से कटे तो फल अच्छा होता है क्योकि इसमें गायत्री के अनुसार आप
न लिखा है। पोपलीला के जप अनर्थरूप फल होने की तो कथा ही क्या है? कोई अच्छा व बुरा किया हुआ कर्म
दिल नहीं होता है।

| पचासवा प्रश्न-धर्म-अधर्म मनुष्य के अन्तरेय भावसे होता है या कर्म के परिणाम से ? यदि कोई मनुष्य
दूबते हुए मनुष्य को बचाने को नदी में कूद पड़े और वह आप डूब जाये तो उसे आत्मघात का पाप होगा या पुण्य ?

उतर-मनुष्यों के धर्म और अधर्म भीतर और बाहर की सत्ता से होते हैं कि जिन का नाम कर्म और कुकर्म भी है,
जो किसी को बचाने के लिए परिश्रम करेगा और फिर उपकार करते हुए जिसका शरीर वियुक्त हो जाये, तो उसको पाप
नहीं पुण्य ही होगा।

रामलाल, पुत्र-बालकिशन अहीर, यदुवंशी ने जो राजा दुर्गा प्रसाद के यहां काम करते हैं, वर्णन किया-=#
जब कायमगंज में सुना कि स्वामी जी बरेली आदि से होते हुए फर्रुखाबाद पधारे हैं तो उसी समय दर्शन के लिए फरूखाबाद
गया । प्रथम मैने गोविन्दलाल वर्तमान मुख्तार न्यायालय रियासत दरभंगा और बद्रीप्रसाद का, जो उक्त जिले के न्यायालय
में वकील है, यज्ञोपवीत स्वामी जी से कराया ।’

एक दिन लाला कालीचरण के बाग में छत के ऊपर श्री स्वामी जी और बहुत से लोग बैठे हुए थे। स्त्रियों के
आने की आहट प्रतीत हुई। उसी समय स्वामी जी ने अपने शरीर पर बगलों के नीचे तक कपड़ा बांध लिया और कहा कि
सी लोग आती हैं। इतने में सैयां आई और श्री स्वामी जी महाराज को दडवत् अर्थात् नमस्ते करके बैठ गई। एक लड़के
का नाम (जिस की आयु दो वर्ष की थी) उसकी माता से पूछा । उसने उसका नाम भीमा बतलाया, स्वामी जी कहने लगे कि
यह नाम अच्छा नहीं । उसकी माता ने कहा कि महाराज ! आप कोई अच्छा नाम रख दीजिये। स्वामी जी महाराज ने उस
का नाम ‘भूराज’ रख दिया और अर्थ कि ‘भू’ कहते हैं पृथिवी को और राज नाम प्रकाश’ का है । इसलिए जो पृथ्वी पर
प्रकाशमान है उस का नाम ‘भूरी’ होना चाहिये । उस की माता और समस्त उपस्थित लोग यह नाम सुनकर प्रसन हुए।
उसकी दो लड़कियां उपस्थित थीं उनके विषय में शिक्षा दी कि प्रथम इन लड़कियों का विद्या पढ़ना आवश्यक है। जब
विद्या पढ़ चढे तब विवाह करा देना अभी विवाह की शीघ्रता नहीं है । लड़कियों को अवस्था उस समय सम्भवतदस-बारह
वर्ष की होगी ।

एक दिन उक्त बाग से व्याख्यान के लिए स्वामी जी घोड़ागाड़ी पर चढ़कर आर्यसमाज के मकान की ओर आ
रहे थे में भी मैच था । एक कुत्ता बड़े जोर से भाँकता हुआ घोड़े के पीछे दौड़ा और थोड़ी दूर चलकर थक कर रह गया ।।
स्वामी जी महाराज ने कहा कि इसका इतना ही सामर्थ्य घा, घोड़े के बराबर किस प्रकार आ सकता था? इसी प्रकार
कपोलकत्पित प्रन्व मानने वाले पोप लोगों का सामर्थ्य है, वे भी प्राचीन वेदमत मानने वालों के सम्मुख शास्त्रार्थ करने में
असमर्थ हो जाते हैं।