उत्तर–वेदों के अतिरिक्त हमारा कोई कपोलकल्पित मत नहीं है। फिर हमारे मत के अनुसार कोई केसे जन
सकता है? क्या तुमने अंधेरे में गिरकर खाना-पीना मल मूत्र करना जती थोटी, अंगरखा घारकना, सोयना
धर्म मान रखा है? काय वेद है कि इन कुमति पुरुषों पर कि जिनौ बाहर र भीठर की टूष्टि पर पदा पड़ हुआ है
कि जूता पहनना या न पहनना धर्म मानते हैं। सनो, और अंख खोत कर देखो ये सब अपने-अपने देशव्यवहार है।

अठारहवां प्रश्न-आपके मत से ज्ञान के बिना मुक्ति होती है या नहीं? यदि कोई पुरुष आपके मतानुसार धनं
पर आरूढ़ हो और अज्ञानी अर्थात् ज्ञानहीन हो तो उसकी मुक्ति हो सकती है या नहीं?
ठतर-परमेश्वर सम्बन्धी ज्ञान के विना मुक्ति किसी की न होगी। सनो पाइबो ! जो धर्म पर आरूढ होगा उस क
को क्या ज्ञान का अभाव कभी हो सकता है? वा ज्ञान के बिना क्या कोई मनुष्य धर्म में टूढ़ आस्दा रख सकता है?
उन्नीसवां प्रश्न-श्राद्ध आदिक अर्थात् पिडदान आदि जिसमें पितृ तृप्ति के अर्थ ब्राह्मणभोजनादि कराते हैं,
शांति है या अशांति? यह यदि अशा खरीदी है तो पितृ कर्म का क्या अर्थ है और मनुस्मृति आदि प्रन्दों में इनका
लेख है या नहीं?

उत्तर-जीते पितरों को श्रद्धा से सेवा, पुरुषार्थ व पदार्थों से तृप्ति करना श्राद्ध और तर्पण कहलाता है। यह तपंज
वेदादि-शास्त्रोक्त है। भोजनभट्ट अर्थात् स्वार्दियों का ता आदि से पेट भरना श्राद्ध और तर्पण शास्र्रोक्त तो नहीं कि्तु
पापों का अनर्थकारक आडम्बर है । जो-जो मनु आदि ग्रंथों में लेख है सो वेदानुकृत होने से माननीय है; अन्य कोई नहीं ।

वीसवां प्रश्न-कोई मनुष्य यह समझ कर कि मैं पापों से मुक्त नहीं हो सकता आत्मघात करे तो उसको कोई पाप
है या नहीं?

उत्तर-आत्मा करने में पाप ही होता है, और भोगे दिना पापाचरण के फल के पापों से मुक्त कोई भी नहीं हो
सकता ।

इक्कीसवां प्रश्न-जीवात्मा संख्यात हैं या असंख्यात ? कर्म से मनुष्य पशु अथवा वृक्ष आदि योनियों में उत्पन
हो सकता है या नहीं ?

उत्तर-ईश्वर के ज्ञान में, जीव संख्यात और जीव के अल्पज्ञान में असंख्यात है। पाप अधिक करने से जीव पशु
वृक्ष आदि योनियों में उत्पन्न होता है।

बाईसवां प्रश्न-विवाह करना अनुचित है या नहीं? स्नान करने से किसी पुरुष पर पाप होता है या नहीं? और
होता है तो क्या?

उतर-जो पूर्ण विद्वान् और जितेन्द्रिय होकर सर्वोपकार किया चाहे उस पुरुष वा री को विवाह करना योग्य नहीं
अन्य सबको उचित है । वेदोक्त रीति से विवाह करके ऋतुगामी होकर सन्तानोत्पत्ति करने में कुछ दोष नहीं । व्यभिचार
आदि से सन्तान उत्पन करने में दोष है, क्योंकि अन्यायाचरणों में, दोष हुए बिना कभी नहीं रह सकता है।

तेईसवां प्रश्न-अपने गोत्र में (विवाह सम्बन्ध करना दूषित है या नहीं, यदि है तो क्यों है? सृष्टि के आदि में
ऐसा हुआ था या नहीं?
उनर अपने गोत्र में विवाह करने से दोष यों है कि इससे शरीर, आत्मा, प्रेम, वल आदि से उनति यथावत्
नहीं होती इसीलिए भिन-भिन गोत्रों में ही विवाह-सम्बन्ध करना उचित है । सृष्टि के आदि में गोत्र ही नहीं वे फिर वृदा