दसवां प्रश्न-जीव का क्या लक्षण है?
उत्तर—न्यायशास्त्र में जीव का लक्षण इच्छा, द्वेष प्रयल, सुख, दुःख, ज्ञान लिखा है।
ग्यारहवां प्रश्न-सूक्ष्म सूत्रों से ज्ञात होता है कि जत में अनन्त जीव हैं, तो फिर जल पीना उचित है या नहीं?

उतर-क्या विज्ञान लोग अपनी मूर्खता की प्रसिद्ध अपने वचनों से नहीं करा देते ? न जाने पर नगर में
कब तक रहेगी । जब पात्र और पात्रस्य जल अन्त वाले हैं तो उनमें अनन्त जीव कैसे समा सकेगे और छानकर या छि
से देख कर जल पीना सब को उचित है।

दारहवा प्रश्न-मनुष्य के लिए बहुत स्त्री करना कहां निषेध है? यदि निषेध है तो धर्मशास्त्र में जो यह लिखा
हुआ है कि यदि एक पुरुष के बहुत सी हों और उन में एक के पुत्र होने से सब पुत्रवती हैं, यह क्यों लिखा ?

उत्तर-देश में मनुष्य के लिए अनेक स्त्रियों के करने का बहु विवाह का) निषेध लिखा है। संसार में प्रत्येक व्यक्ति
अच्छा नहीं होता। जो अनेकअधम पुरुष कामातुर होकर अपने विषयसुख के लिए बहुत-सी स्त्री कर लेवें तो उनमे (परस्पर)
सपलीमे (शौकत के भाव) से विरोध अवश्य होता है। जब किसी एक स्त्री के पुत्र हुआ तो कोई विरोध से विष आदि के
प्रयोग से न मार डाले इसलिए यह लिखा है।
तेरहवां प्रश्न-आप ज्योतिष शास्त्र के फलित ग्रन्थों को मानते हैं या नहीं और भृगुसंहिता आप्त अन्य है या नहीं?

उत्तर–हम ज्योतिष शास्त्र के गणित भाग को मानते हैं, फलित भाग को नहीं; क्योकि ज्योतिष के जितने
सिद्धांत-अन्य हैं उन में फलित का लेश भी नहीं है। भृगुसिद्धान्त-जिस में केवल गणित विद्या है, उसको हम आप्त अन्य
मानते हैं इतर को नहीं । ज्योतिष शास्त्र में भूत, भविष्यत् काल का सुख-दु:ख विदित होना अनाप्तोक्त ग्रन्थों के अतिरिक्त
– अर्थात् अप्रमाणित व्यक्तियों की लिखी हुई पुस्तकों के अतिरिक्त कहीं नहीं लिखा।

चौदहवां प्रश्न-ज्योतिष शास्त्र में आप किस ग्रन्थ को आप्त ग्रन्थ समझते हैं?
उत्तर-ज्योतिष शास्त्र में जो जो वेद नकल ग्रन्थ है,उन सबको हम आप्त अन्य मानते हैं, अन्य को नहीं ।

पन्द्रहवां प्रश्न-आप पृथ्वी पर सुख, दु:ख, विद्या, धर्म और मनुष्य संख्या की न्यूनता-अधिकता मानते हैं या
नहीं ? यदि मानते हैं तो आगे इनकी वृद्धि घी या अब है या होगी?

उत्तर-हम पृथ्वी में सखादि वदि आदि की व्यवस्था को सापेक्ष होने से अनियत मानते हैं; मध्यावस्था में समान
जानो ।

सोलहवां प्रश्न-धर्म का क्या लक्षण है और धर्म सनातन है या परमेश्वरकृत अथवा मनुष्यकृत?

उत्तर-जो पापरहित न्याय की जिसमें सत्य का ग्रहण और असत्य का परित्याग हो,वह धर्म का लक्षण कहलाता
ॐ सो वह सनातन, ईश्वरोक्त और वेद प्रतिपादित है; मनुष्य-कल्पित कोई धर्म नहीं ।

सत्रहवां प्रश्न-यदि कोई मतानुयायी आपके अनुसार मोहम्मदी या ईसाई है और आपके मत में दृढ़ विश्वास हो
जाये तो कया आपके मतानुयायी उसको ग्रहण कर सकते हैं या नहीं और उसका पाक किया हुआ (पकाया) भोजन आप
और आपके मतानुयायी कर सकते हैं या नहीं ?