जीवन में कर्म आदि भी अनादि है। चार मनुष्यों की आत्मा में थेदोपदेश करने का यह है कि उन के दशया ।।
पृष्यात्मा जीव कोई भी नहीं था। इस से परमेश्वर में पक्षपात कछ नहीं आ सकता
एठा प्रश्न-आपके मतानुसार न्यूनाधिक क्रमानुसार फल होता है तो मनुष्य स्वतन्त्र कैसे है? परमेश्वर सर्व है।
तो उस को भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान है पति उसको यह ज्ञान है कि कोई परुष किस समय में कोई कर्म करेगा और
परमेश्वर का यह ज्ञान सत्य नहीं होता क्योंकि वह सत्य ज्ञान वाला है अप्पत वह पुरुष पैसा ही कर्म करेगा जैसा कि
परमेश्वर का ज्ञान है तो कर्म इस के लिए नियत हो चक, तो फिर जीव स्वतन्त्र कैसे है?

उत्तर-कर्म के फल न्यूनाधिक कभी नहीं होते कयोकि जिसने जैश और जितना कर्म किया हो उस को वैसा और
उतना ही फल मिलना न्याय कहलाता है। अधिक-न्यूत होने से ईश्वर में अन्याय आता है।

हे आय ! क्या ईश्वर के ज्ञान में भूत भविष्यत् काल का सम्बन्ध भी कभी होता है? क्या ईश्वर का ज्ञान होकर
न हो और न होकर होने वाला है? जैसे ईश्वर को हमारे आगामी कर्मों के होने का ज्ञान है वैसे मनुष्य अपने स्वाभाविक
गुण-कर्म-साधनों के नित्य होने में सदा स्वतन्त्र है परन्तु अनिच्छित द:खसरूप पापों का फल भोगने के लिए ईश्वर की व्यवस्था
में परतंत्र होते हैं। जैसा कि राजा की व्यवस्था में चोर और डाकू पराधीन हो जाते हैं वैसे उन पापपुण्यात्मक कमों के
दु:ख-सुख होने का ज्ञान मनुष्य को प्रथम नहीं है। क्या परमेश्वर का ज्ञान हमारे किये हुए कमों से उलटा है। जैसे वह अपने
ज्ञान में स्वतन्त्र है वैसे ही सब जीव अपने कर्म करने में स्वतन्त्र है।

सातवां प्रश्न-मोक्ष क्या पदार्थ है?

उत्तर-सब दुष्ट कर्मो से छूटकर सब शुभ कर्म करना जीवन्मुक्ति और सब दु:खो से कर आनन्द से परमेश्वर
में रहना, यह मुक्ति कहलाती है।

आठवां प्रश्न-धन बढ़ाना अथवा शिल्प विद्या व विद्या विद्या से ऐसा यन्त्र अर्थात् कला तथा औषधि निकालना
जिस से मनुष्य को इन्द्रिय जन्य शंख प्राप्त हो अथवा पापी मनुष्य जो रोगप्रस्त हो उस को औषधि आदि से नीरोग करना,
धर्म है या अधर्म है?
| उत्तर न्याय से धन बढ़ाने, शिल्प विद्या करने, परोपकार बुद्धि से यार वा औषधि सिद्ध करने से धर्म और अग
करके करने से अधर्म होता है। न्याय से आत्मा, मन इन्द्रिय, शरीर को सख प्राप्त हो तो धर्म और जो अन्याय से (आत्मा
आदि को सुख प्राप्त) हो तो अधर्म होता है । जो पापी मनुष्य को अधर्म से छुड़ाने और धर्म में प्रवृत्त करने के लिए औषधि
आदि से रोग छुड़ाने की इच्छा हो तो धर्म, इस से विपरीत करने से अधर्म होता है।

नव प्रश्न–तामस भोजन (मांस) खाने से पाप है या नहीं? यदि पाप है तो वेद और आप्त ग्रन्थों में हिंसा करना
यज्ञ आदिकों में क्यों विहित है और भक्षण अर्थ हत्या करना क्यों लिखा है?
उत्तर-मांस खाने में पाप है। वेदों तथा आप्त ग्रन्थों में कहीं भी यज्ञ आदि के लिए पशहिंसा करना नहीं लिखा
है। गो, अश्व, अजमेध के अर्थ वाममार्गियों ने बिगाड़ दिये हैं। उनके सच्चे अर्थ, हिंसा करना, कहीं भी नहीं लिखा । हो ।
जैसे डाकू आदि दष्ट जीवों को राजा लोग मारते, उन का बन्धन और छेदन करते हैं; वैसे ही, हानिकारक पशुओं को मारना
लिखा है। परन्तु मार कर उनको खाना कहीं भी नहीं लिखा। आजकल तो वाभियों ने झूठे श्लोक बनाकर गोमांस खाना
भी बताया है जैसे कि मनुस्मृति में इन धूर्त से मिलाया हुआ लेख है कि गोमांस का पिड देना चाहिये । क्या कोई पुरुष
ऐसे भ्रष्ट वचन मान सकता है?