शव को चीर कर नाइ़ी-अन्ध की जांच ऋषि की मौलिकता असत्य a vणा ।। गत (र उन
हुआ कि पता नहीं यह ठीक भी है या नहीं। तो ठीक होने में मुन्नो देश ।। ।। ५ ।।४ ।।
का प्रयत्न करता रहा परन्तु आज तक मेरे यह संदेह दूर गहीं हो सो और [ो हो दूर ।।।।।।।।।।।। । त
निरहुआ ।एक दिन की बात है कि बहका अकसमात एक शव गदी १ र ५। ४।। (गा। उसे ।। ।। ।।
मिला था कि मैं उनकी परीक्षा करता और अपने मन को उन बा । (५ । । । । । (खी ५, ७ ॥९॥
की निवृत्त करता । अतः उन पुस्तकों को जो गारे पारा भी एक ओर अपने रागीपरणार ।।।। । ठ ।रगतक
नदी में घुसा और शोधता से भीतर जाकर शव को पकड़ कर तट पर लाबा । मैंने उसको एक तोज चाबू से, अच्छी प्रकार
वैसे मुझ से हो सकता था, काटना प्रारंभ किया । मैंने इृदय को उरामें से निकाल लिया और यापूर्वक ।। hara
और देखा और हृदय को पानी से पशु को काटकर मैंने अपने सामने रखकर देखो । गमगा और जो वर्णन परक
में दिया था उससे समता करने लगा और इसी प्रकार सिर और गर्दन के एक भाग यो भी टयर गो रखा । यह
जानकर कि इन पुस्तकों और शव में आपस में कोई समानता नहीं ले पाए र उनो हे हे र हाते।
और शव को एक कर साथ ही उन परतकों के टकड़ों को भी नदी में फेक दिया । धीरे-धीरे उ गरी में शत परिणाम
निकालता गया कि वेद, उपनिषदों, पातल योग और सांख्य दर्शन के अतिरिक्त समस्त पुरत ओवज्ञान और गोगतिया
पर लिखी गई है निर्षक और अशुद्ध है।

गंगा तटवर्ती स्थानों का भ्रमण–गंगा नदी के तट पर कुछ दिन और इसी प्रकार फिर कर मैं फिर फरखावाद
पहुंचा और जब कि सरन जी राम* से होकर मैं छाव-ी के पर्ष जाने वाली सड़क से कानपुर यो आने वाला था तो रांवत्
१९१२ विक्रमी (तदनुसार ५ अप्रैल १८५६) समाप्त हुआ (उस समय आपकी आयु ७२ या की ।

कानपुर, इलाहाबाद से बनारस में(संवत १९१३) -अगले पांच महीनों में गैंने कई बहे-बड़े स्थान जो वानपुर
और इलाहाबाद के मध्य मे दे-देखे। भाद्रपद तदनुसार अगस्त मास सन् १८५६ के आरम्भ में रविवार को गिर्जापुर के
समीप बनारस में जा पहुंचा जहां एक मास से अधिक काल तक में विन्ध्याचल अशोल के मन्दिर में छहरा। आरज
(१५ सितम्बर १८५६ सोमवार) के प्रारम्भ में बनारस पहुंचा और उस स्थान पर आकर उस गुफा में ठरा ॥ धरना और
गंगा के संगम पर स्थित है और जो उस समय भवानन्द सरस्वती के गाने में थी। यहां पर कई शास्त्रियों माराम,
राजाराम आदि से मेरी घेट हुई । वहां मैं केवल १२ दिन ही रहा तत्पश्चात् (जिस वस्तु की खोज में गा उरा लिये आगे
से चल दिया।

अपने दोस्त की स्वीकारोक्ति तथा उसका परित्याग-अक्टूबर सन् १८५६ बुधवार तदनुसार आज
सुदी २ संवत् १९१३ को दुर्गा कृष्ण के मन्दिर पर जो चोहालगढ़ में स्थित है, पहुंचा ॥ वहां गैने दस दिन व्यतीत किये।
वहां मैंने चावल खाने बिलकुल छोड़ दिये और केवल दूध पर अपना निर्यात करके दिन रात योगा गाने और उसके
अभ्यास में सतमन रहा । दुर्भाग्य से इस स्थान पर मुझे एक बड़ा व्यसन लग गया । ग ग शेती करने ।
अभ्यास पड़ गया और प्राय- उसके प्रभाव से मैं मूर्छित हो जाया करता था। एक दिन की बात है। मन्दिर में से निकलकर
एक ग्राम की ओर जो बांध रगड़ के समक्ष है, जा रहा था वहां मुझको पिछले दिनों का पति मेरा एक सामी मिला ।
गांव के दूसरी ओर कुछ दूरी पर एक शिवालय था जहां मैंनेजाकर रात व्यतीत की। वहीं जब में ही मादकता की दरा
में मूर्छित पर सोता था तो मैने एक स्वप्न देखा और वह यह एथा अघांत् मुझे ध्यान आया कि में गदेव और उसकी बी