अपनी 11 । अचान मला राहीना ने | T1 में चाय
टन कम अन्य ।। गामा मु द्धशानिप्रत्रता आग को चसा और कुछ समय तक
माँ तीन शान है। 2 और ‘गाना राम 0 आरपार । म ठारी शाम को आट,
।।म बद्रीनारायण मया
यानी । श्रम अट-अटेक जी और मोदी व पाये हुए 4, श्राद्धर्य-चीन
उन म पूछा कि आप दिन तुम तय anा था अशश ना दिया। उस रात्रि
| | साना ठा, ५ म] शनि जरा से से लौटती प्रतीत हो गया परनदरे दिन प्रात:कास
उदार रावल र आगजनी आज्ञा मांगी और अपनी यात्रा पर चल पड़ा और रामपर
किया। उस शाम को चलता चलता में पक बोगी के घर जा पहुँचा जी एक बढड़ा भारी टपासक ा और टसके घर पर रात
दती । वह योगी जीवित किया और राशि में अत्यन्त कोटि वा प्रति गा और धार्मिक विषयों पर टसके
हम बहुत समय तक मेरी बातचीत हुई।
अपने निश्चय का पहले से अधिक दढ करके मैं अगले दिन प्रात:काल उटते ही आगे की चल दिया और कई
जा और पर्वत म स हारकर और चिलाटी (ये पिल्या शाट) पर से टठर कर मैं अन्त में ‘रामपर पहुंच गया और वह

वा कर मन प्रसिद्ध रामनगर के गेट पर निवास किया। यह व्यक्ति अपने जीवन की बात बटी पवित्रता और आत्मिक
आयन शुद्धता के कारण बहुत बियात था। “नि भी उसको विचित्र खचाव का देसी अर्थात वह गोता नहीं था प्रत्युत
गरी रात से शब्द से बात करने में व्यतीत कर देता था और वह बाते वह प्रकटतया अपने साथ ही करता प्रतीत हाता
दा। प्राक बहे ऊंचे शब्द से हमने ठररको चीख माते समा और फिर कई बार हमने उसको रोते हुए और चीख मारते अववा
| वन करते हुए पाया परन्तु जब ठोकर देखा तो वहां उसके कमरे में उसके अतिरिक्त और कोई मनुष्य दिखाई न दिया ।
यात से अत्यन्त भक्त तथा आश्चर्यान्वित है और मैंने उसके शिष्यों आदि से पूछा तो उन बेचारों ने केवल यही
तता दिया कि इसका ऐसा ही स्वभाव है परन्तु कोई मुझको यह न बतला सका कि इसका क्या अर्थ है । अन्त में जब मैंने
| ई बार एक साधु से निजी से एकान्त में भेंट की तो मुझको विदित हो ही गया कि वह क्या बात थी और इस प्रकार से
1 बात का निश्चय करने के योग्य हो गया कि अभी वह जो कुछ करता है वह पूरी-पूरी योगविद्या का परिणाम नहीं
प्रत्यत उसमें अभी कमी है और यह वह चीज नहीं है जिसकी मुझको खोज है और न यह पूरा योगी है, प्रत्युत योग में कुछ
निपुणता रखता है।

काशीपुर आदि की ओर-से विदा होकर मैं कानपुर गया और वहां से ‘द्रोणसागर’ पहुंचा जहा मैने शीत
यतीत की। हिमालय पर्वत पर पहुंच कर देह नाग देना चाहिये ऐसी इच्छा हुई परन्तु यह विचार मन में आ गया कि
प्राप्ति के पश्चात् देह छोड़नी चाहिये । वहां से आगे ‘मुरादाबाद’ होता हुआ मैं ‘सम्भल’ जा पहुंचा और वहां से
“गढ़मुक्तेश्वर’ को पार करता हुआ फिर गंगा नदी के तट पर पहुंचा। उस समय और धार्मिक पुस्तकों के अतिरिक्त मेरे
“। लिखित पुस्तकें भी थी—शिव संध्या’, हठप्रदीपिका, योगबीज, केसराना संगीत’*-इन पुस्तकों को में अपनी
“श में प्राय पढ़ा करता था । इनमे से कुछ के विषय हठ योग और नाड़ीचक्र अर्थात् मनुष्य की नाडियों को बताने वाली
नहा से सिद्ध से। इनमें ऐसी बातों का ऐसा लंबा चौड़ा वर्णन किया हुआ था कि मनुष्य पढ़ता-पढ़ता थक जाता था
और उसको मैं कभी भी रूप से अपनी बद्री के वश में म ला सका और न पूर्णरूप से कभी मैं उनको स्मरण कर सका
और न पूर्ण रूप से समझ सका।