अलगदा के उमर की ओर अलख नदी के कीट मारक भार से प्रभुकपा से फुटकारा–दिद।
के होते ही में अपनी यात्रा पर चल पा और पर्वतों के मन में से होता हुआ अतखनन्दा नदी के तट पर जा पाया। मः।
उस नदी के पार करने की वानिक भी इन बी क्योकि मैचे उस पदी के दूसरी ओर घम’ नामक महापामा
इसलिए अभी उस पर्वत की पाटी में ही चलता है नदी के बराव के सा-साप जगन की ओर ही लिपी । पर्वत ।
और टोले आदि सब हिमाकादित थे और बहुत घनी बर्फ उनके ऊपर थी इसलिये अलखनन्दा नदी के उदगम गा.
पहुंचने में मुझको महान् कष्ट उठाने पड़े। परन्तु जब में वहां गया तो अपने आप को नितान्त अपरिचित और विदेश ।
और अपने चारों ओर ऊंची-ऊंची पहाड़ियां खड़ो देखा तो मुझे आगे जाने का मार्ग बन्द दिखाई दिया। थोड़े समय पर
सड़क पूर्णतया अदृश्य हो गई और उस मार्ग का मुझ को कोई पता न मिला। मैं उस समय चिन्ता में था कि क्या कर
चाहिये ।विवश होकर मैंने अपने मार्ग की खोज के लिए उस नदी को पार करने का दढ़ निश्चय कर लिया। मेरे पर
बस बहुत हत्के और थोड़े से और सदन बहुत तीव्र दी। थोड़े ही समय पश्चात् ऐररी प्रबल सी हो गई कि उसका मन
करना असम्भव । भूख और प्यास ने जब मुझको बहुत ही सताया तो मैंने एक टुकड़ा बर्फ का खाकर सकी बुद़ाने द
निश्चय किया परन्तु उससे कुछ शान्ति प्राप्त न हुई। फिर मैं नदी को पैदल ही पार करने लगा। किसी किसी स्थान पर ।
बरत गहरी थी और कुछ स्थान पर पानी बहुत कम था परन्त एक हाय अपवा आधे गज से कम गहरा कहीं न दा परन्
चौड़ाई उदात्त पेट में दस हाथ तक या अर्थात दे कहीं से चार गज और कहीं से पांच गज था । नदी बर्फ के छोटे और बिहे
टकड़ों से परी हुई थी जिन्होंने मेरे पांव को अत्यन्त घायल कर दिया और मेरे नंगे पावों से रक्त बहने लगा। मेरे पाव छ।
के कारण बिल्कुल सुन हो गये थे जिसके कारण बड़े-बड़े व्रणो का भी मुझे कुछ समय तक ज्ञान न हुआ। इस स्थान पर
अत्यन्त शीत के कारण मुझको मृच्छा-सी आने लगी। यहां तक कि मैं सन होकर बर्फ पर गिरने को था। मैने अवत
किया कि यदि मैं यहां पर इसी प्रकार गिर गया तो फिर यहां से उठना मेरे लिये अत्यन्त कठिन और दुष्कर होगा।अन
बहुत दर्द धूप करके जिस प्रकार हुआ में बहुत कठिन चेष्टा करके वहां से सकुशल निकला और नदी की टूसरी ओर जञ
पहुंचा। यद्यपि वहां जाकर कुछ समय तक मेरी ऐसी दशा रही कि मैं जीवित की अपेखा मानो अधिक मृतकपनको अवस्था
में या तथापि मैंने अपने शरीर के ऊपर के भाग को बिल्कुल नंगा कर लिया और अपने समस्त वस्रं से जो मेंने पहने हुए
दे-पटनों या पाँव तक जांघों को लपेट लिया और वहां पर मैं नितान्त शक्तिहोन और घबराया हुआ आगे को हिल मकने
और चल सकने के अयोग्य होकर खड़ा हो गया और इस प्रतीक्षा में था कि कोई सहायता मिले जिससे में आगे को दल
परन्तु इस बात को कोई आशा न थी कि सहायता हों से आवेगी। सहायता की प्रतीक्षा में दा परन्तु बिलकत अकेला था
और जानता था कि कोई स्थान सहायता का दिखाई नहीं देता। अन्त में फिर मैंने एक बार अपने चारों ओर देखा और
अपने सामने दो पहाड़ी मनुष्यों से आते हुए पाया जो कि मेरे समीप आये और मुझको प्रणाम करके उन्होंने अपने साथ घर
जाने के लिए बुलाया और कहा कि आओ हम तुम खाने को भी देंगे । जब उन्होंने मेरे कष्टों को सुना और मेरे वृत्तान्तु से
परिचित हुए तो कहने लगे कि हम तुमको सिद्धत (जो कि एक तीर्थ स्थान है) पर भी पहुंचा देंगे परन्तु उना मुझको बह
सब कहना कुछ अच्छा प्रतीत न हुआ । मैंने अस्वीकार कर दिया और कहा कि महाराज ! खेद है कि मैं आपको यह कृपायुक्त
बातें स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि मुझमें चलने को बिलकुल शक्ति नहीं है। यद्यपि उन्होंने मुझसे बड़े आधरह से बुलताया
और आने के लिए बहुत कुछ विवश किया परन्तु मैं उसी स्थान पर पांव जमाए हुए खड़ा रहा और उनके कथन तथा
इच्छानुसार उनके पीछे चलने का साहस न कर सका। जब मेैं उनको कह चुका कि मैं यहां से हिलने से देश करने से
अपेक्षा मर जाना अच्छा समझता हूं और इस प्रकार कहकर मैंने उनकी बातों की ओर ध्यान देना भी छोड़ दिया अर्थाट
उनकी बातों को मैंने फिर न सुना। उस समय मेरे मन में विचार आता था कि अच्छा होता यदि मैं लौट गया होता