*सहय वलने लगे तो स्वामी जी ने उनसे पूछा कि पादरी साइब, कल भी आओगे ? इसके ठतर में पादरी साहबर ने अत्द्
क्रोध में आकर बहुत कोलाहल पुर्वक कुछ कहा परन्तु किसी को समझ में नहीं आया कि उन्होंने
इसके पश्चात् मिस्टर पारमर और गार्टलेन ने मेरे द्वारा स्वामी जी से बातचीत करने की प्रार्थना
ने स्वीकार किया और व्याख्यान के स्थान से उठकर बरामदे में उनके पास चौकी पर बैट गये । मिस्ट गर्टलेन सान
-स्वामी जी से बात बीत आरम्भ करना चाहते थे।कि मिस्टर विपिनमोहन बोस (पादरी रामचन्द्र के भाई) ने वाइविल के बारे
में बातचीत छेड़ दी। पांच से साढ़े सात तक तो व्याख्यान होता रहा था। आठ बजे के लगभग ठप से (मि।
बातवीत आरम्भ हुई । दस बजे तक बातचीत होती रही ।सारा समय बोस साहब हेडमास्टर मिशन स्कूल देहरादूद ने से
लिया अन्ततः बीच में ही हेडमास्टर और मिस्टर गार्टलेन का आपस म झगड़ा हो गया। हेडमास्टर साहब बाविस
सिद्ध करते थे और कार्टून साहब खंडन। दोनों को चुप कराने का बहुत यल किया गया परन्तु वे चुप न हए या
अन्य किसी से बातचीत न हुई।

उस दिन मुसलमान भी बहुत आये थे जिन में से कुछ मौलवी थे। उसी दिन के वर्णन (व्याख्यान) में ब्रह्मसम
के नियमों (सिद्धान्तो) का खंडन किया था जिससे वे भी विरुद् हो गये और प्रत्येक प्रकार की सहायता करने से इन्कार का
जिया । स्वामी जी का वचन पूरा हुआ। सारांश यह कि १२ बजे रात तक वहां बातचीत होती रही ।’
निर्भय दयानन्द-जिस बंगले में स्वामी जी उतरे थे, वह फूस का था। मुझे घर आकर यह सूचना मिली कि आज
रात को स्वामी जी का बंगला जलाया जायेगा। मेरे हृदय में भय उत्पन्न हुआ। इस पर प्रथम तो स्वामी जी को सुचना दे
दी और दो-तीन अपने नौकर वहां भेज दिये और दो चौकीदार नियत किये। रात को पंडित भीमसेन भी जागते रहे परन्तु
स्वामी जी हमें आश्वासन देते रहे

*दूसरे दिन जब मैं दफ्तर गया तो थोड़ी देर पश्चात् मेरा भतीजा पीछे-पीछे आया और कहने लगा कि लगभग
एक से पचास मुसलमान स्वामी जी के मकान पर पहुंच गये हैं जो उपद्रव करने पर उद्यत प्रतीत होते हैं। यह सुनकर मेरे
चित में बड़ा जोश उत्पन हुआ और गहब से आज्ञा लेकर वहां पहुंचा परन्तु वे मेरे पहुंचने से पहले ही चले गये थे। उस
समय वहां कोई उपस्थित न था। स्वामी जी के मुख से विदित हुआ कि मुसलमानों की एक बड़ी भीड़ उन के पास पहुची
थी उन्होंने कहा कि हम से शास्त्रार्थ करो। अपने को अनुचित आरोप हमारे मत पर लगाया है, उसकी सफाई कीजिये ।।
हमने कहा कि मैं एक-एक से शालार्थ नहीं कर सकता । प्रथम शास्त्रार्थ की शर्ते तैयार हों फिर जो तुम में से अधिक विद्वान्
हो, वह मुझसे शास्त्रार्थ कर सकता है। उन लोगों ने नियम तैयार करके फिर आने को कहा और उससे दूसरे दिन अर्थात्
व्याख्यान के तीसरे दिन ठीक व्याख्यान के समय मुसलमानों ने अपने नियम उपस्थित किये जो समस्त सभा के सामने पड़े।
गये। विदित हुआ कि वे एकपक्षी हैं और मौलवी अहमद हसन का उन में नाम था। स्वामी जी ने लोगों से पूछा कि कोई
उनसे परिचित हो तो बतलावे कि वे कैसे व्यक्ति हैं ? लोगों ने कहा कि निस्सन्देर वे विद्वान् पुरुष हैं और वीडीगार्ड में।
नौकर है। तब स्वामी जी ने नियम स्वीकार करके जो परिवर्तन करना था, वह उचित रूप से करके वापस दे दिया । उस
दिन व्याख्यान धर्म विषय पर था जो अच्छी प्रकान निर्विध्नतापर्वक समाप्त हुआ। उस दिन (के व्याख्यान में) एक ही अंग्रेज
मिस्टर बर्कले साहब उपस्थित थे।

चौथे दिन पुराणों के विषय पर व्याख्यान हुआ जिसमें मूर्तिपूजा का खंडन आदि भी आ गया और किसी ने कोई
शंका न की।