गोस्वामी दुर्गाप्रसाद ने वर्णन किया-स्वामी जी पन्द्रह दिन रहे और ११ व्याख्यान दिये।
था । एक दिन उन्होंने व्याख्यान में कहा कि जगत् चार प्रकार का है एक तो बकरी के प्रकार का जो पानी पीती है और
पानी को सूचित किये बिना उठकर चली जाती है । दूसरा भैसे के प्रकार का जो पीते हैं, उसी में मुतते हैं और पानी को गंदला
भी करते है (शेष दो स्मरण नहीं)।
यहां पर एक दिन स्वामी जी के पास एक चिट्ठी इस विषय की आई कि मुझ को विरोधियों ने किया।
था कि स्वामी जी मर गये हैं। मैं बड़ा शोकातुर था परन्तु अब जो सुना कि आप जीवित हैं, मुझे बड़ी प्रसन्नता
जी ने कहा कि देखो ! धूर्व लोग कितनी शरारत करते हैं। फिर उन को सन्तोषजनक पत्र लिख दिया।

यहां के एक पंडित भागीरथ जी स्वामी जी को मेरठ में मिले । वे जब गये तो स्वामी जी ने कहा कि
में पग अड़ाने के अभिप्राय से आये हो ताकि लोगों को विदित हो कि यह भी दयानन्द स्वामी से संस्कत बस
तुम अभी जाकर पूछो।’

यहां से २ जनवरी, सन् १८७९ को रेल
द्वारा दिल्ली को पधार गये । राव साहब
ने अत्यंत आदर
और सत्र से
विदा किया था।
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दिल्ली का वृत्तान्त (१० जनवरी,*र सन् १८७९ से १५ जनवरी, ** सन् १८७९ तक)
२ ० को रिवाड़ी से सवार होकर उसी दिन दिल्ली पहुंच कर काबुली दरवाजे सब्जीमंडी के पास बालमुकदद
किशोर चंद” के मोतीबाग में निवास किया। ९ से ११ तक कोई व्याख्यान नहीं दिया। जो लोग डेे पर आते रहे उन
सत्योपदेश करते रहे । १२ जनवरी, सन् १८७९ को पहला व्याख्यान दिया। इस बार केवल दो या तीन व्याख्यान दिये
६ दिन रहकर मेरठ पधार गये और वहां से शीघ्र हरिद्वार चले गये।

देहरादून का वृत्तान्त (१४ अप्रैल, सन् १८७९ से ३० अप्रैल, सन् १८७९ तक)

स्वामी जी हरिद्वार के कुम्भ में प्रचार कर देहरादून पधारे । धर्मप्रचार के साथ विश्राम करने का भी विचार था
क्योंकि हरिद्वार के दिन रात के परिश्रम के कारण और रोग के कारण शरीर में दुर्बलता आ गई थी।

रुड़की-निवासी पंडित कृपाराम गौड़ तथा वर्तमान समय देहरादून के निवासी ने वर्णन किया—’अप्रैल में स्वामी
जी का पत्र हरिद्वार से आया कि हम पर्वी से दूसरे दिन देहरादून को कुच करेंगे जिससे इस बात की चिन्ता उत्पन्न हुई कि
कोई स्वतंत्र मकान लिया जावे। अन्त में कछ बंगाली सज्जनों को सम्मति से मिस डक का बंगला निश्चित किया गया।
इसक पश्चात् बाबु श्यामलाल का पत्र हरिद्वार से आया कि कर्नल अल्काट साहब और मैडम ब्लेवेत्स्की स्वामी जी से
मिलने के लिए वहां आयेंगे, इनके लिए भी बंगले का प्रबन्ध कर रखना परन्तु शीघ्र ही दूसरी चिट्ठी आई कि कुछ आवश्यकता
नहीं, वे देहरादून नहीं आयेंगे।
। १४ अप्रैल, सन् १८७९ को स्वामी जी के आने की सूचना थी । उस दिन मैंने हरिद्वार की सड़क पर अपने भतीजों
और दो सेवकों को इसलिए भेज दिया कि वे स्वामी जी को (उस) ज्ञात बंमले पर साथ लिवा लावें । स्वयं छुट्टी न मिलने
के कारण उपस्थित न हो सका। १० बजे के लगभग, मेरे पास दफ्तर में सूचना पहुंची कि स्वामी जी आ गये मं अपने
अफसर से पूछ कर स्वामी जी से मिलने गया । देखा कि वहां बहत-से बंगाली सज्जन एकत्रित हैं। उनमें से एक ने गाडी
का किराया भी अपने पास से दे दिया था। पंडित भीमसेन, नीलाम्बर और एक विद्यार्थी-कुल तीन परुष स्वामी