उपदेश सुनकर पकके विश्वास हो गये । महाराजा को कई सम्प्रदाय तोगों ने बहका दिया था। महाराज यदपि न आये
से परन सब प्रकार के अतिथि सत्कार का प्रबंध कर दिया था।

यह दिनचर्या यह थी कि प्रात: ४ बजे उठते थे । शौच करके और थोड़ी देर एकान्त में बैठकर ध्यान करने के
फिर चार-पांच कोस प्रमण को जंगल में निकल जाया करते थे। वहां से सात बजे के पश्चात् लौट कर आते और फिर
दयानन्द को कुछ लिखाने बैठते और ११ बजे के समीप स्नान करके मृत्तिका शरीर पर लगाते थे । फिर कोटी में जाकर
व्यायाम करते १२ बजे अर्थात् केवल एक ह समय खाना खाते । शाम को दूध पीते थे और तम्बाकू कभी-कभी मूंह में
लेते थे।

उनके चले जाने के पश्चात् मैने स्थान-स्थान पर मूर्तिपूजकों और ईसाइयों से वैदिकधर्म के विषय में शास्रार्थ
आरम्भ कर दिये और मिशन स्कूल के द्वार पर भी किसी-किसी ईसाई से शास्त्रार्थ होता रहा। कभी-कभी बाजार में पंच के
रूप में खड़े होकर उपदेश किया करता । एक बार कुछ छात्रों सहित जा रहा था कि ऊपर एक मकान पर एक रामसनेही
साधु बैठा था। एक लड़के ने उस को देखकर नमस्ते किया। दूसरा बोल उठा कि ये नमस्ते को नहीं समझते,ये तो राम-राम
जानते हैं। इस पर उक्त साधु ने कुपित होकर कहा कि तुम लोग इस ओर आओ, तुमने क्या कहा ! हम लौट आये। मैने
उसे कहा कि तुम यह बताओ कि क्या राम नाम परमेश्वर का है जैसा कि आज तक तुमने मान रखा है। यह किस वेद का
है या किस शास्त्र के अनुसार है? वह कहने लगा कि हां, राम नाम वेदों में है। हमने कहा कि किस वेद के किस अध्याय
और किस मन्त्र में ? इसका उत्तर वह बिलकुल न दे सका और घबरा गया।’
रिवाड़ी का वृत्तान्त (२४ दिसम्बर, २८ सन् १८७८ से ९ जनवरी, सन १८७९ तक)

राव युधिष्ठिर सिंह पुत्र राव तुलाराम (जो ८५ ग्रहों के जमींदार थे) दिल्ली के शाही दरबार में गये थे। वहीं
स्वामी जी का विज्ञापन देख उनसे मिलने गये । दर्शन और बातचीत के पश्चात् उनसे प्रार्थना की कि आप हमारे यहां पधानं;
में आपका उपदेश सुनना चाहता हूं। राव साहब को सत्य धर्म का अधिक इच्छुक देख स्वामी जी ने कहा कि हम आपको
स्थिर-बाद देखेंगे तो वैदिक धर्म की शिक्षा अवश्य देंगे । तत्पश्चात् बहुत समय तक परस्पर पत्रव्यवहार होता रहा । अन्ततः
सत्य धर्म की खोज के प्रति उनका बहुत अधिक अनुरोध देखकर जयपुर से तार दिया कि हम रिवाड़ी आते हैं। सवारी और
निवास स्थान का प्रबंध कर दें । रावसाहब ने तलापुरियों के बाग में जो नगर से आधा मील पूर्व की ओर है स्वामी जी के
ठहरने का प्रबन्ध किया। बड़े आदर-सत्कार से स्वामी जी को लाये । चार व्यक्ति स्वामी जी के साथ थे।
| राव मानसिंह रईस रिवाड़ी ने वर्णन किया नंगा और रेलवे स्टेशन के मार्ग में जो हमारे पूर्वजों की छत्रियां और
तालाब है, उन पर स्वामी जी के व्याख्यान होते रहे जिसके पास अब गिर्जाघर बना हुआ है। मूर्ति खंडन, मृतकश्राद्धखंडन
गायत्री और वेद का अधिकार सब को है, महीधर भाष्य का खंडन किया और ब्रह्मा और उसका अपनी कन्या से व्यभिचार
की कहानी का युक्तिपूर्वक खंडन करके उसका सत्यार्थ बतलाया। पादरियों और मुसलमानों के स्वर्ग का खंडन करके
वैदिक मुक्ति को सिद्ध किया और कहा कि जैसे पौराणिक लोग हुण्डी लिखा करते हैं वैसे ही पादरी भी हुण्डी लिखा करते
हैं। गायत्री के व्याख्यान के दिन कहा था कि ब्राह्मण हम से क्रुद्ध होंगे और मन में कुढते होंगे कि यह सब के सामने गायत्री
पढ़ता है परन्तु मैं उनकी भलाई के लिए सुनाता हूं। फिर सब े सामने गायत्री सुनाई और उस व्याख्यान के आरम्भ में
साम्राज्ञी के उत्तम राज्य को धन्यवाद दिया कि हम उसकी कृपा से सत्यधर्म का उपदेश करते हैं। अन्यथा सम्भव नहीं था
कि हम इस प्रकार उपदेश कर सकते । श्राद्ध विषय में उदाहरण दिया था कि यदि वास्तव में मुतक को श्राद्ध(काअन्न आद)
पहुंचता है और वही वस्तु जो यहां ब्राह्मणों को खिलाई जाती है, पहुंचता है तो जो लोग मांसभक्षण के समर्थक हैं, उनके