में गया। वहां से लगभग सात बजे वापस आये। उन पंडितों के मझ से प्रतिज्ञा कर ली थी कि तम्हारे लीटते तक अच्छी
प्रकार लैम्प, दरी आदि का प्रबंध कर रखेंगे परन्तु जब हम वापस लौटे और बग्घी को मन्दिर के द्वार पर लेकर पहुंचे ती
देखा कि वहां मन्दिर में न दीपक है और न दरी और न कोई मनुष्य ही वहां दिखाई दिया। मैंने ठतर कर घूछ तो एक पुजारी
कोठरी से बोला कि यहां कोई प्रबन्ध नहीं । जब यह वुतांत स्वामी जी को विदित हुआ तो वे कुछ उतेजित होने के पश्चात्
कहने लगे कि यह तुमने कैसा अच्छा प्रबंध किया ? मैंने कहा कि महाराज मैं विवश हैं, जो मेरे सहायक थे वे कच्चे
निकले ।’ अस्तु । अब में शीघ्र दूसरा प्रबन्ध करता है और में पैदल बग्णी के आगे-आगे स्वामी जी को कल्लू महाराज की
दुकान और पुलिस स्टेशन के समीप ले आया और तत्काल कल्लू महाराज और दीनामल कोतवाल को स्वामी जी के आने
को सूचना दी। वे तत्काल निकल आये और कहा कि स्वामी जी कहां हैं? मैंने उनको स्वामी जी से मिलाया और यामी
जी के सामने उनसे मैंने यह वृत्तान्त कहा कि अब कोई मकान निश्चित करना चाहिये । कल्लू महाराज ने भी ला० दीनाल
को प्रेरणा की कि मकान की खोज अवश्य और शीघ्र करो। वे बाजार में गये और कोई दस मिनट पश्चात् वापस आकर
कहा कि चलो, मकान सजा-सजाया तैयार है और उसी समय मुनतालाल जी के मकान में स्वामी जी को ले गये। स्वामी जी
बेटे और लोग दल बांध-बांध कर आने आरम्भ हो गये, परन्तु इन दो पण्डितों अर्थात् गोकलचन्द और कालिदास ने मुख
तक न दिखलाया।’

व्याख्यान आरम्भ होने को था कि मुन्नालाल और हीरालाल नामक सरावगियों ने आकर प्रश्न करने आरम्भ किये ।
इसमें लगभग १५-२० मिनट व्यतीत हो गये। वे दोनों स्वामी जी के उतर सुनकर मौन हो गये। तव प्रथम व्याख्यान आरम्भ
हुआ। उस दिन साठ-सत्तर मनुष्य सम्मिलित थे । नौ बजे व्याख्यान समाप्त हुआ, स्वामी जी उठकर बग्घी में बैठकर चले
गये। उन्हीं दिनों शराब गायों के बहकाने से पांच-चार लड़कों ने ताली पोटना और कोलाहल करना आरम्भ किया। तब मैंने
लाला दीनामल जी की सहायता से उनको भयभीत किया। इस पर वे मौन हो गये और स्वामी जी लगभग दस बजे अपने
निवासस्थान पर पहुंचे।

दूसरे तीसरे दिन भी इसी विषय पर व्याख्यान होते रहे। फिर कोई कोलाहल न हुआ और न किसी ने प्रश्न या
शंका की। दूसरे दिन एक सौ पचास और तीसरे दिन लगभग दो सी मनुष्य थे। सामने पादरी लोगों के बेले-चांटे थे।
व्याख्यानों को सुनकर कोई भी तर्कवाद नहीं करता था प्रत्युत यही कहते थे कि स्वामी जी का व्याख्यान बहुत श्रेष्ठ है, बहुत
अच्छा है। बगीचे में भी विभिन्न लोग प्रश्नोतर करने आते थे। स्वामी जी ने यह कह दिया था कि जिस किसी को
शंका समाधान करना हो, वह वहां दिन का आवे । कई लोग गये और सन्देह निवृत्त करते रहे।

एक दिन किसी मनुष्य ने स्वामी जी से अपने कितने ही प्रश्नों में यह प्रश्न भी किया कि मास खाना और मद्य पीना
ठीक है या नहीं? स्वामी जी ने कहा कि मध्य तक ही क्या सीमित है, किसी प्रकार का भी नशा अच्छा नहीं, अपितु (प्रत्येक
नशा) त्याज्य समझना चाहिये । रहा मांस के विषय में, वह बिना जीवहत्या के मिल नहीं सकता इसलिए सत्यशास्त्र और
वेदोक्त रीति से मांस खाना भी ठीक नहीं प्रत्युत पाप है।

चौवे दिन तीन बजे रेलवे स्टेशन पर आकर सीधा जयपुर का टिकिट लिया अर्थात् १४ दिसम्बर, सन् १८७८
को नसीराबाद से सीधे जयपुर को चले गये।
पंडित सुखदेव प्रसाद जी ने कहा-जयपुर के विषय में सुना कि वहां के प्रधान मंत्री फतहसिंह जी ने स्वामी जी
का बड़ा सत्कार किया और वे आया-जाया भी करते थे और शिक्षाविभाग के अफसर बाबू श्री वल्लभ जी स्वामी